
राठौड़ों की कुलदेवी हैं माता नागणेच्या, कन्नौज से सारस्वत ब्राह्मण लाए थे प्रतिमा
जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने राठौड़ों की कुलदेवी माता नागणेच्या मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 1523 में मेहरानगढ़ में की थी। इतिहास के पन्नों में राठौड़ों का मारवाड़ आगमन 13वीं शताब्दी के मध्य माना गया है। राठौड़ वंशज राव धूहड़ ने जोधपुर से करीब 90 किमी दूर पचपदरा परगने के गांव नागाणा में प्रतिहार थिरपाल को परास्त करने के बाद नागणेच्या देवी की प्रतिमा एक मंदिर में प्रतिष्ठित की थी। इस संदर्भ में एक अन्य मत यह है कि मूर्ति राव धूहड़ स्वयं नहीं लाए, उनके पुरोहित सारस्वत ब्राह्मण कन्नौज से लेकर आए थे।
जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि ‘राव धुहड़ विक्रम संवत 1248 ज्येष्ठ सुदी तेरस ने कर्नाटक देश सूं कुल देवी चक्रेश्वरी री सोना री मूरत लाय न गांव नागाणे थापत किवी। तिनसु नागणेची कहाई।’ मूर्ति में सिंह पर सवार मां नागणेच्या के मस्तक पर नाग फ न फैलाए हैं। माता के हाथों में शंख चक्र आदि हैं। नागणेच्या माता को मंशा देवी, राठेश्वरी, पंखणी माता के नाम से भी संबोधित किया गया है। मेहरानगढ़ के जनाना महल में प्रवेश करते समय दायीं तरफ माता नागणेच्याजी का मंदिर बना है। मंदिर परिसर के चार गर्भगृह में हिंगलाज, सिंगलाज माता, चतुर्भुज और शिव-पार्वती की चांदी की प्रतिमाएं हैं।
जोधपुर महाराजा जसवंसिंह (1638-1678) के स्वर्गवास के बाद औरंगजेब ने मेहरानगढ़ पर अधिकार कर लिया तब सभी मंदिरों को नष्ट करने का प्रयास किया गया। उस समय अमरसिंह राठौड़ के पुत्र इन्द्रसिंह मंदिर की मूर्तियों को बचाने के लिए सभी मूर्तियों को नागौर ले गए जिन्हें बाद में 1707-08 में महाराजा अजीतसिंह ने दुर्ग पर पुन: अधिकार के बाद नागौर से मंगवाकर पुन: प्रतिष्ठित किया था।
Published on:
04 Oct 2019 01:13 pm
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