
Machiya Fort Kala-Pani of Jodhpur
आजादी के दीवानों के जंगी हौसलों का गवाह रहा मरुधरा का एेतिहासिक गौरव माचिया किला समय की परतों में दब गया है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई में वतनपरस्तों के कैदखाने के तौर पर उनके जंगी हौसलों के गवाह रहे एेतिहासिक माचिया किले के वीरान खंडहरों को 68 साल बाद भी सन्नाटे के टूटने का इंतजार है। एेतिहासिक किले में गलियारों, दालान और चौक में दर्ज स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई यातनाओं की स्मृतियां वीरानी के साए में दफन होती जा रही है।
वीरानी और गुमनामी के अंधरा
माचिया किले में दिसम्बर 1942 से अगस्त 1943 तक करीब 8 माह तक 32 स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद रखा गया था। अगस्त 1943 में भारी वर्षा के कारण किले की चहारदीवारी ढहने के बाद सभी बंदियों को बिजोलाई महल शिफ्ट किया गया। उस समय जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह व अंग्रेज सरकार के प्रतिनिधि के रूप में डोनाल्ड फील्ड अधिकारी थे। वर्तमान में यह एेतिहासिक किला जंगे आजादी के परवानों की तरह विसरा देने के बाद पूरी तरह वीरानी और गुमनामी के अंधरे में डूब चुका है।
वन विभाग ने लगाया प्रतिबंध
आजादी के बाद कई वर्षों तक लोगों का बेरोकटोक आना रहा लेकिन 1 जुलाई 1990 में माचिया वन खंड को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने के बाद आम जनता के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कायलाना झील के पास माचिया वनखंड की सुरम्य पहाड़ी पर महत्वपूर्ण स्मारक माचिया किले में फिलहाल कबूतरों का एकछत्र राज है। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की स्मृति को चिरस्थाई रखने के लिए आजादी के स्वर्ण जयंती वर्ष के दौरान 15 अप्रेल 1999 में निर्मित कीर्ति स्तंभ पर जमी मिट्टी की परत को भी जोधपुर की एक स्वयंसेवी संस्था के सदस्यों को वनविभाग के अधिकारियों की विशेष अनुमति लेकर साफ करना पड़ता है।
नियम की बेडि़यों में माचिया किला
जिन लोगों ने देश को आजाद देखने के लिए यातनाएं सही थी, उन्हीं की कर्मभूमि वन संरक्षण अधिनियम की बेडि़यों में जकड़ी हुई है। माचिया किले में निर्मित कीर्ति स्तंभ के दाएं-बाएं और पीछे की तरफ उन क्रांतिकारियों के नाम उत्कीर्ण हैं, जिन्हें सात माह तक माचिया किले में बंदी रखा गया था। किले तक पहुंचने के लिए बनी पगडंडी नेचर ट्रैक भी क्षतिग्रस्त है।
शिकारगाह को बना दिया यातना केंद्र
प्राकृतिक वनस्पतियों, तालाबों और 23 प्रजातियों के वन्यजीवों से घिरे रहे माचिया किले को जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह ने जंगली सुअरों के शिकार के लिए बनवाया था। जोधपुर शहर के नजदीक सबसे रमणीक स्थल कभी राजा महाराजाओं का एेशगाह रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सिपाहियों और उनके साथियों को कमजोर बनाने की नीति के तहत जोधपुर जेल से चुनिंदा लोगों को भयंकर यातना देने के मकसद से समूह के रूप में माचिया किला भिजवाना आरंभ किया था।
तत्कालीन सरकार ने यह कदम राज बंदियों और उनके नेताओं की ओर से जेल में चलाए जा रहे आंदोलन से परेशान होकर उठाया था। दिसम्बर की भीषण सर्दी में जंगली सुअरों और वन्यजीवों के बीच किले में रखना किसी भयानक यातना से कम नहीं था। लेकिन जंगे आजादी के परवानों ने यह कष्ट हंसते-हंसते झेल लिया। महाराजा तख्तसिंह के बाद इस गुमनाम जगह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और यह उजाड़ होता चला गया।
बन सकता है पर्यटन स्थल
प्राकृतिक सौन्दर्य की छठा बिखेरने वाले माचिया किले में निर्मित दालान की छत से कायलाना, तख्तसागर झील और मेहरानगढ़ का मनोरम दृश्य आकर्षक नजर आता है। यदि माचिया बॉयोलॉजिकल पार्क के साथ दर्शकों के लिए किले के प्रवेश द्वार खोल दिए जाएं तो जोधपुर आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों के लिए एक और पर्यटन स्थल और जंगे आजादी के सिपाहियों की यातनाओं से जुड़ा स्मारक लोगों में देशभक्ति का संचार कर सकता है।
स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए बनी थी योजना
स्वतंत्रता आंदोलन की कमर तोडऩे के लिए ब्रिटीश हुकूमत ने स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं को को उनके साथी राजबंदियों से अलग करने की नीति के तहत तत्कालीन सरकार ने जोधपुर जेल से मुख्य कार्यकर्ताओं को समूह के रूप में रियासत के विभिन्न किलों में भेजने की नीति अपनाई थी।
सरकार ने सजा काटकर घर जाने वाले आंदोलनकारियों को पुन: आंदोलन में कूदने की समस्या से निपटने के लिए तय किया कि सजा काट चुके उसी बंदी को रिहा जाएगा, जो लिखित में बयान दे कि वह जेल से छूटने के बाद ब्रिटिश सरकार व अन्य रियासती सरकारों के खिलाफ परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से कोई कार्रवाई नहीं करेगा और ना ही इसमें सहायक बनेगा। एेसा नहीं लिखकर देने वालों को जेल से बाहर निकलते ही गिरफ्तार कर जोधपुर के नजरबंद कैम्प माचिया किले में भेज दिया गया।
ये थे माचिया किले में नजरबंद स्वतंत्रता सेनानी
रणछोड़दास गट्टानी, राधाकृष्ण बोहरा तात, भंवरलाल सर्राफ, तारकप्रसाद व्यास, शांति प्रसाद व्यास, गणेशचन्द्र जोशी, मौलाना अतहर मोहम्मद, बालकृष्ण व्यास, पुरुषोत्तमदास नैयर, नरसिंगदास लूंकड़, हुकमराज मेहता, द्वारकादास पुरोहित, माधोप्रसाद व्यास, कालूराम मूंदड़ा, गोपाल मराठा, पुरुषोत्तम जोशी, मूलराज घेरवानी, गंगादास व्यास, हरिन्द्र कुमार शास्त्री, इन्द्रमल फोफलिया, छगनलाल पुरोहित, श्रीकृष्ण कल्ला, तुलसीदास राठी (सभी जोधपुर), शिवलाल दवे नागौर, देवकृष्ण थानवी, गोपाल प्रसाद पुरोहित, संपतलाल लूंकड़, (सभी फालोदी), भंवरलाल सेवग पीपाड़, हरिभाई किंकर, मीठालाल त्रिवेदी सोजत, शांति प्रसाद व्यास, अचलेश्वर प्रसाद शर्मा मामा, बालमुकुंद बिस्सा, जोरावरमल बोड़ा, गिरिजा जोशी को काला पानी की सजा के समकक्ष माने जाने वाले माचिया किले में रखा गया। जानवरों से भी बदतर खाना देने के विरोध में सभी नजरबंद सेनानियों ने सात दिन तक भूख हड़ताल की, जिसे जयनारायण व्यास (जो बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने) के हस्तक्षेप से समाप्त कराया गया।
विरासत के रूप में सहेजें माचिया किले को
माचिया किले को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर आमजन को देखने के लिए खोल देना चाहिए। किले में जिन 32 स्वतंत्रता सेनानियों को कैद में रखा गया वहां का अधिकांश हिस्सा खण्डहर में तब्दील हो चुका है। देश आजाद होने के बाद छह दशकों तक गुमनाम रहे माचिया किले को राजस्थान पत्रिका ने वर्ष 2015 में पुन: प्रकाश में लाने का प्रयास किया। इससे पूर्व मैंने 24 अप्रेल 1991 में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक से माचिया किले के जीर्णोद्धार और स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र लगाने की मांग की थी। उसके बाद पत्रिका की ओर से समाचारों के प्रकाशन के बाद आध्यात्मिक क्षेत्र पर्यावरण संस्थान समिति ने स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के सहयोग से माचिया किले में नजरबंद रहे स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें लगाई गई है। वनविभाग ने भी वीरान माचिया किले की दालान में लोहे के दरवाजे, खण्डहर की मरम्मत और किले तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क का निर्माण किया है। माचिया किले के आस-पास सघन पौधरोपण किया जाना चाहिए। जब वनक्षेत्र रणथम्बौर में लोगों को टाइगर देखने की इजाजत है, तो स्वंत्रता सेनानियों के स्मारक दर्शन में वनविभाग के कानून बाधक क्यों बने हैं, यह मेरे समझ से परे है।
-रामजी व्यास, अध्यक्ष, आध्यात्मिक क्षेत्र पर्यावरण संस्थान समिति, जोधपुर
Published on:
29 Jan 2017 07:29 am
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