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Mahaveer Jayanti: 105 साल पहले बना था यह दिगंबर जैन मंदिर

Mahaveer Jayanti का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर Jain Community के लोगों ने श्रद्धा व उल्लास के साथ महावीर जयंती शोभायात्राएं निकाली। जोधपुर में लगभग एक सौ से अधिक झांकियों से युक्त शोभायात्रा में समूचा जैन समाज उत्साह के साथ शामिल हुआ। इस मौके पर आइए आपको बताते हैं जोधपुर के दो प्रसिद्ध जैन मंदिरों (Famous Jain Temples) की कहानी-

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Mahaveer Jayanti:  105 साल पहले बना था यह  दिगंबर जैन मंदिर

Mahaveer Jayanti: 105 साल पहले बना था यह दिगंबर जैन मंदिर

जोधपुर. दिगंबर जैन समाज जोधपुर का मुख्य मंदिर जोधपुर रेलवे स्टेशन के सामने स्थित है। मंदिर की व्यवस्था व संचालन जैन पंचायत जोधपुर की ओर से किया जाता है। दिगम्बर जैन मंदिर का निर्माण करीब 105 साल पूर्व हुआ था। जोधपुर में दिगंबर जैन समाज के वर्तमान में करीब 300 घर है। मंदिर में मूलनायक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान है। मंदिर में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजनशाला, विश्राम और ठहरने के लिए भी कक्ष बने हैं ।

पश्चिम राजस्थान के एकमात्र मंदिर का निर्माण अजमेर के सेठ राय बहादुर भागचंद सोनी के निर्देशन में देखरेख में हुआ था । मंदिर के गर्भ गृह मे सोने की नक्काशी व कांच का बहुत ही सुंदर कार्य किया गया है। मंदिर का मुख्य गुंबद करीब 41 फीट ऊंचाई पर है जो दूर से ही नजर आता है ।मुख्य वेदी के साथ चंद्रप्रभ भगवान और शांतिनाथ भगवान भी विराजमान है। मंदिर में मूलनायक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान है।

जिसे जमीन इनायत हुई, उसी के नाम बना जैन तीर्थ
जोधपुर में जैन समाज की आस्था के केंद्र भैरूबाग जैन तीर्थ में साल 1991 से निरंतर अखंड ज्योत जल रही है। इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण लगभग डेढ़ सौ साल पहले हुआ था। इसकी प्राचीनता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन महाराजा मानसिंह ने 191 साल पहले विक्रम संवत् 1888 श्रावण वदी चतुर्दशी को श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन यति गुरां सा भैरवचन्द के नाम से बीस बीघा भूमि इनायत की थी। इस भूमि पर गुरां साहब ने पार्श्वनाथ का एक मन्दिर, एक कुआं, एक बगीचा तथा अन्य इमारतों का निर्माण करवाया। गुरां सा भैरवचन्द के देवलोक गमन के पश्चात् उनके शिष्य भीवचंद ने भेंटनामा के जरिए समस्त भूमि व मंदिर आदि संवत् 1911 मिगसर सुदी 6 को जैन संघ जोधपुर को सुपुर्द कर दी। इस क्षेत्र का नाम भी गुरां सा भैरवचन्द के नाम पर भैरूबाग ही रखा गया। गुरां साहब का स्मारक भी इसी भूमि पर बनवाकर उनकी चरण पादुकाएं स्थापित की गई, जो अभी ओसवाल कम्युनिटी सेन्टर के पास स्थापित है । इसकी देखरेख व पूजा -अर्चना प्रारम्भ से ही भैरूबाग तीर्थ करता है। इस तीर्थ के वर्तमान विकास के प्रेरक आचार्य विजय वल्लभ सूरीश्वरजी हैं। जैनाचार्य ने विक्रम संवत 1988 में जोधपुर प्रवास के दौरान इस मन्दिर के दर्शन कर कहा कि सरदार स्कूल के नए व विशाल भवन के पास इसके विस्तार की जरूरत बताई। उनकी प्रेरणा से जोधपुर संघ ने पूर्व निर्मित मूल मंदिर को वैसा ही रखते हुए एक नए व विशाल मंदिर तथा जैन धर्मशाला के निर्माण की योजना बनाई। चार साल बाद आचार्य देव विजयनीति सूरीश्वर जी ने नूतन मन्दिर की आधारशिला रखी और 1998 में आचार्य देव विजयलब्धि सूरीश्वर महाराज. के सानिध्य में प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई।

दर्शनीय है चांदी व नक्काशी का काम

दोमंजिला मन्दिर के ऊपर के भाग में चिन्तामणी पार्श्वनाथ की आकर्षक प्रतिमा है। साथ ही अन्य 12 जिन प्रतिमाएं तथा पार्श्वं पद्मावती व पार्श्व यक्ष विराजमान है। सभा मंडप में कांच का आकर्षक कार्य दर्शनीय है। अन्य जिन प्रतिमाओं के साथ नाकोड़ा भैरव, पद्मावती देवी, चक्रेश्वरी देवी, दादागुरू की चरण पादुकाएं आदि दर्शनीय है। मंदिर में चांदी का नक्काशी कार्य दर्शनीय है। मंदिर में वर्ष 1991 से अखण्ड ज्योत चालू है। तीर्थ में 50 कमरों की धर्मशाला व भोजनशाला भी है।