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जोधपुर . जोधपुर-बाड़मेर सीमा पर स्थित कोरना गांव में पक्षियों का सतरंगी संसार बसने लगा है। जिले के आगोलाई से महज १० किमी दूरी पर स्थित थार क्षेत्र में जैव विविधता का नया इतिहास जुडऩे से पर्यावरणविद् और पक्षी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी खासे खुश और उत्साहित हैं। कोरणा गांव जोधपुर जिले के खींचन के बाद साइबेरिया, कजाकिस्तान व आस-पास के ठंडे देशों से आने वाले प्रवासी पक्षी कुरजां का दूसरा पसंदीदा स्थान बनता जा रहा है।
वर्तमान में करीब ४ हजार से अधिक कुरजां समूह ने कोरणा गांव में डेरा डाल रखा है। कुरजां के अलावा यहां पक्षियों की करीब ६० प्रजातियां भी नजर आई हैं। कुरजां के अलावा रफ एंड रीव पक्षी भी बड़ी तादाद में पहुंचे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कुरजां और रफ एंड रीव पक्षियों को क्षेत्र के ग्रामीण किसी भी तरह का चुग्गा नहीं डालते हैं। प्राकृतिक आधार होने के साथ-साथ यह मरुस्थलीय खाद्य शृंखला होने के कारण पक्षियों के लिए बेहतर आश्रय स्थल बन सकता है।
ग्रामीणों के साथ पत्रिका की मुहिम रंग लाई
जोधपुर-बाड़मेर सीमा पर स्थित पचपदरा तहसील के कोरना के ग्रामीणों ने पॉवर सब स्टेशन के निर्माण के विरोध में लंबी लड़ाई लड़ी और जैव विविधता कायम रखने के लिए जीत हासिल की थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने कोरना गांव की करीब ४०० बीघा चरागाह ओरण भूमि क्षेत्र में पांच जलाशयों के पास ७६५ केवी ग्रिड सब स्टेशन जीएसएस बनाने के आदेश पर रोक लगा दी थी। ग्रामीणों की ओरण बचाओ मुहिम में राजस्थान पत्रिका ने भी पूरा सहयोग किया । कोरना में पक्षियों के आगमन का कारण क्षेत्र में किसी भी तरह का मानवीय हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं है। हमने हाल ही में कोरणा के पक्षी व वन्यजीव बहुल क्षेत्र को कन्जर्वेशन रिजर्व क्षेत्र घोषित करने के लिए वन विभाग को प्रस्ताव भेजा है।
-कुलदीप सिंह राठौड़, ग्रामीण, कोरना
अनछुआ वेटलैण्ड बन सकता है राष्ट्रीय उदाहरण
कोरना गांव में इस बार बड़ी संख्या में कुरजां के साथ विविध प्रजातियों के पक्षियों ने डेरा डाला है। शीतकाल में इस अनछुए वेटलैण्ड पर पक्षियों की संख्या लगातार बढऩे की उम्मीद है। कम्युनिटी कन्जर्वेशन के दृष्टिकोण से यह राष्ट्रीय उदाहरण बन सकता है। लेसर विजलिंग डक का आगमन भी अच्छा संकेत है। यह सब क्षेत्र के ग्रामीणों की जागरूकता से ही संभव हो पाया है।
-शरद पुरोहित, पक्षी प्रवास विशेषज्ञ
हो सकते हैं जैव विविधता के नये आयाम स्थापित
दक्षिणी पूर्वी यूरोप, साइबेरिया, उत्तरी रूस, यूक्रेन व कजाकिस्तान से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर कुरजां के समूह गुजरात व राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में शीत प्रवास के लिए आते हैं। जिले के खींचन में हर साल २० से २५ हजार पक्षी पहुंचते हैं। इस बार जोधपुर-बाड़मेर सीमा पर कोरना गांव में कुरजां के साथ ब्लैक आईविश, स्टार्क, ग्रीन बी ईटर, कोरमोरेंट, किंगफिशर, इंडियन रोलर, चिंकारे, मरु लोमड़ी, नील गाय और खरगोश आदि बड़ी तादाद में नजर आना थार की जैव विविधता समृद्ध करने की दिशा में नये आयाम स्थापित कर सकता है।
डॉ. हेमसिंह गहलोत, पक्षी विशेषज्ञ
Published on:
03 Oct 2017 10:16 am
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