
सोजती गेट जोधपुर। फाइल फोटो- पत्रिका
संदीप पुरोहित
आदमी पहचाना जाता है कयाफा देख कर
खत का मजमूं भांप लेते हैं लिफाफा देख कर।
से ही किसी भी शहर के इतिहास, विरासत, संस्कृति और पुरावैभव की पहचान उसके परकोटे और दरवाजों से ही होती है। जोधपुर के सात दरवाजे उसकी विरासत का अभेद्य हिस्सा हैं। इतिहास गवाह है, यह दरवाजे हमारे सुख दुख के साथी रहे हैं। दुश्मनों के सामने सीना तानकर भी खड़े रहे तो शहर के सौंदर्य को चार चांद भी लगाते रहे। आज इनकी दुर्दशा हो रही है, पर हमारे रहनुमाओं को यह नजर नहीं आता।
विरासत की आंखों से आंसुओं का मिरासिम बहुत पुराना है। केवल सोजती गेट के जीर्णोद्धार से काम नहीं चलने वाला है। यहां काम चल रहा है, जो स्वागत योग्य कदम है। लेकिन साथ ही एक सवाल भी खड़ा करता है कि क्या बाकी दरवाजों का कोई कसूर है? इतिहास बताता है कि 16वीं सदी में राव मालदेव ने जब किले से बाहर शहर का विस्तार किया तो जोधपुर को एक मजबूत दीवार से घेर दिया गया। नगर की सुरक्षा के लिए भव्य दरवाजे बनाए गए, जिनसे गुजर कर ही नगर में प्रवेश होता था। इन दरवाजों के नाम भी उस दिशा और रास्ते के अनुसार रखे गए, जहां से लोग आते-जाते थे। समय के साथ ये नाम केवल दरवाजों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आसपास के पूरे इलाकों की पहचान बन गए।
यह उल्लेखनीय है कि मालदेव के बाद महाराजा अभय सिंह और बख्त सिंह ने इनका विस्तार कर नामकरण भी दिशा के अनुसार कर दिए थे। उत्तर दिशा में नागौर की ओर खुलने वाला नागौरी गेट उस दौर में व्यापारिक काफिलों का प्रमुख रास्ता था। दक्षिण-पश्चिम दिशा में जालोरी गेट जालोर की राह का द्वार था। पूर्व दिशा में मेड़ती गेट मेड़ता की ओर जाने वाले मार्ग का संकेत देता था, जो उस समय सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर था। सोजती गेट सोजत की दिशा में खुलता था, जहां से मेहंदी और वस्त्र व्यापार का आवागमन होता था। सिवांची गेट सिवाना की ओर जाने वाले रास्ते का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता था। वहीं चांदपोल गेट को लेकर लोक-मान्यता है कि चांदनी की पहली किरण इसी दरवाजे पर पड़ती थी।
ये दरवाजे केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि शहर के इतिहास की जीवित गवाह हैं। दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ इनका महत्व कम होता चला गया। आज कई दरवाजों में पुलिस चौकियां चल रही हैं, तो कहीं इनके आसपास पशु बाड़े तक बना दिए गए हैं। संरक्षण और सौंदर्य के स्तर पर इनकी स्थिति चिंता का विषय है। ऐसे में यदि केवल सोजती गेट की मरम्मत होती है और बाकी दरवाजे उपेक्षा के शिकार बने रहते हैं, तो यह अधूरा प्रयास ही माना जाएगा।
जोधपुर की विरासत किसी एक दरवाजे तक सीमित नहीं है। हर दरवाजा अपने साथ इतिहास की एक अलग कहानी लेकर खड़ा है। जोधपुर के सभी दरवाजे पुरात्तव विभाग की ओर से संरक्षित स्मारक घोषित हैं।
जरूरत इस बात की है कि शहर की इस ऐतिहासिक धरोहर को समग्र रूप से देखा जाए। सभी दरवाजों के संरक्षण और मरम्मत की योजना बने, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे जोधपुर के इतिहास को पढ़ सकें। क्योंकि सवाल फिर वही है- जब सब जोधपुर की धरोहर हैं, तो बाकी दरवाजों का कसूर क्या है?
sandeep.purohit@in.patrika.com

Published on:
18 Mar 2026 07:09 pm
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