9 मार्च 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

निगहबान- इंसाफ मांगती है माचिया ‘जेल’

यह जेल राजाओं की शिकारगाह थी। जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तो सेनानियों का यहां मारवाड़ की सेलुलर जेल यानी माचिया किला जेल में बंदी बनाकर यातनाएं दी गईं।

2 min read
Google source verification
Machia Jail, Jodhpur Machia Jail, Jodhpur News, Rajasthan News, Sandeep Purohit, Sandeep Purohit Article, nighaban, निगहबान, माचिया जेल, जोधपुर माचिया जेल, जोधपुर न्यूज, राजस्थान न्यूज, संदीप पुरोहित, संदीप पुरोहित आर्टिकल

माचिया जेल- फोटो पत्रिका

संदीप पुरोहित
आजादी के बाद सेलुलर जेल को तो राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया, पर जोधपुर की माचिया जेल को आज तक स्मारक का दर्जा भी नहीं दिया गया। यही नहीं, हम अपने स्वाधीनता सेनानियों को नमन करने के लिए आज भी वहां जा नहीं सकते। साल में सिर्फ दो बार इस जेल को खोला जाता है।

राजस्थान पत्रिका समाचार समूह ने जोधपुर की जनता की आवाज बनकर इस मुद्दे को उठाया। पिछले 15 अगस्त को भी वहां पत्रिका की पहल पर झंडारोहण का कार्यक्रम हुआ। साथ ही स्वाधीनता सेनानियों के परिवारों का सम्मान भी किया गया। इस अवसर पर सेनानियों के परिवार भावुक हो गए थे। माचिया किला जेल मारवाड़ की काल कोठरी थी। बीहड में एक ऐसी जेल जहां स्वतंत्रता सेनानियों पर जुर्म ढाए गए। यह जेल राजाओं की शिकारगाह थी। जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तो सेनानियों का यहां मारवाड़ की सेलुलर जेल यानी माचिया किला जेल में बंदी बनाकर यातनाएं दी गईं।

इस जेल में स्थापित शौर्य स्मारक में 32 लोगों के नाम अंकित है, पर यह संख्या हकीकत में ज्यादा है। रिकॉर्ड में बहुत से नाम चढ़ाए ही नहीं गए। स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी आजाद भारत की यह तीर्थस्थली अपने वजूद को तलाश रही है। इंसाफ मांग रही है अपने अस्तित्व के लिए। आखिर इसे स्मारक का दर्जा देने में समस्या क्या है पर किसी सरकार ने इसमें कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई। हां, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पहले कार्यकाल में यहां कुछ काम किया, पर वह स्वाधीन भारत के इस पावन तीर्थ के साथ इंसाफ नहीं कहा जा सकता है।

केंद्रीय पर्यटन एवं सांस्कृतिक मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत वहां सरकारी अमले के साथ पहुंचे। उन्होंने इसे स्मारक बनाने की बात तो की है। यह कोई आम स्मारक नहीं होगा, बल्कि प्रेरणा पुंज होगा। जहां आने वाली पीढ़ियां हमारी इतिहास से रूबरू होंगी। मंत्रीजी आगे बढ़े अच्छी बात है, पर सरकार में बैठे हुक्मरान न तो माचिया को जानते हैं और न ही इससे जुड़ी मारवाड़ की जनभावनाओं को। यहां लैंड स्कैपिंग या भव्य भवन के निर्माण से ज्यादा इतिहास के संरक्षण की आवश्यकता है। स्मारक का ब्लू प्रिंट बनने से पूर्व ही व्यापक विचार विमर्श जनसमिति बनाना अति आवश्यक है, ताकि माचिया जेल के साथ पूर्ण इंसाफ हो सके। उम्मीद जगी है कि माचिया को एक स्मारक के रूप में विकसित कर आमजन के लिए खोल दिया जाएगा।
sandeep.purohit@epatrika.com