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Moharram शिया समुदाय की परंपराएं और फानी जोधपुरी का सलाम

जोधपुर.पैगम्बरे इंसानियत पैगम्बर हजरत मोहम्मद ( Prophet Hazrat Mohammed ) के नवासे इमाम हुसैन ( Imam Hussian ) सहित करबला के मैदान में शहीद हुए तमाम शहीदों की याद में मातमी मोहर्रम ( Karbala Muharram ) मनाया जा रहा है। मोहर्रम पर सुन्नी समुदाय की खबरें और परंपराएं तो आपने जानी होंगी। इस मोहर्रम पर हमको बता रहे हैं शिया समुदाय ( Shia community ) की परंपराएं।    

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जोधपुर

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MI Zahir

Sep 09, 2019

जोधपुर.पैगम्बरे इंसानियत पैगम्बर हजरत मोहम्मद ( Prophet Hazrat Mohammed ) के नवासे इमाम हुसैन ( Imam Hussian ) सहित करबला के मैदान में शहीद हुए तमाम शहीदों की याद में मातमी मोहर्रम ( Karbala Muharram ) मनाया जा रहा है। मोहर्रम पर सुन्नी समुदाय की खबरें और परंपराएं तो आपने जानी होंगी। इस मोहर्रम पर हमको बता रहे हैं शिया समुदाय ( Shia community ) की परंपराएं।

नोहाख्वानी और मातमजनी ( Nohakhwani and Matamzani )

हर साल की तरह इस साल भी शिया मुस्लिम समुदाय इस्लामी नव वर्ष की शुरुआत इमाम हुसैन( Imam hussain ) के गम में डूब कर रहा है। इस अवसर पर शिप हाउस स्थित अजाखाने में इस्लामी हिजरी सन के मोहर्रम की पहली तारीख से ले कर दस मोहर्रम तक मजलिसो-मातम का प्रबंध किया गया है, जिसमें अंजुमने-हुसैनी की मेजबानी में पैगम्बर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन के मानव कल्याणकारी कार्यों और अहिंसक संघर्ष की दास्तान बयान की जा रही है। अंजुमने-हुसैनी जोधपुर के अध्यक्ष सय्यद अशफाक आबिदी ने बताया कि इस साल अंजार से आए शिया धर्म गुरु रोशन अली मोहर्रम महीने की दस तारीख तक रोज मजलिस को संबोधित कर रहे हैं। इसके बाद शिया परंपरा के अनुसार शिया समुदाय के लोग मातम कर रहे हैं, जिसे नोहाख़्वानी कहते हैं। वहीं वे शोक प्रदर्शन यानी ‘मातम जनी भी कर रहे हैं। वे यहां इमाम हुसैन के मानवता के लिए करबला के मैदान में उठाई गई तकलीफों को याद किया जा रहा है।

कुनबे समेत शहीद हुए

शिया कौम की संस्था अंजुमने-हुसैनी ( Anjumane Hussaini ) के संगठन सचिव सैयद सरताज अली रिज़वी ने बताया कि मोहर्रम इस्लामी नव वर्ष का पहला महीना है। इसमें पैग़म्बर हजरत मोहम्मद सअव के नवासे हजरत इमाम हुसैन ( Imam hussain ) को उनके कुनबे के साथ शहीद कर दिया गया था।

भारत आ रहे थे इमाम हुसैन

रिज़वी ने बताया कि इमाम हुसैन अरब से भारत के लिए रवाना हुए थे, मगर इराक के करबला नामक स्थान पर उन्हे रोका गया । ख़ेमों तक जाने वाली नहर को रोक कर हुसैन और उनके कुनबे का पानी बंद किया गया और तीन दिन प्यासे हुसैन को उनके घराने के समेत शहीद कर दिया गया।

सच्चाई की लड़ाई

उन्होंने बताया कि इमाम हुसैन की उस वकक्त के जालिम बादशाह यज़ीद के साथ यह लड़ाई इस्लाम के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई,हक़ और इन्सानियत के लिए थी।

करबला के शहीदों को फानी का सलाम

सय्यद सरताज अली रिजवी ( Sayyed Sartaj Ali Rizvi ) शाइर भी हैं और वे फानी जोधपुरी ( Fani jodhpuri ) के नाम से शाइरी करते हैं। उनकी गजलों के शेर तो आपने सुने ही होंगे। मोहर्रम ( Karbala Muharram ) पर इस बार उनका लिखा सलाम ( poetic salam ), खास आपके लिए :


सब्र पे शब्बीर के फूली-फली है करबला
इस्तेआरा आदमीयत का बनी है करबला

सब्र, ईसारो-वफ़ा सब में ढली है करबला
पानियों पर प्यास से लिक्खी हुई है करबला

कुफ्ऱ की तारीकियों को चीर कर आती हुई
क़ल्बे-इन्सानी पे ठहरी रौशनी है करबला

करबलाई के लिए इन्सानियत ही शर्त है
ज़ात,मज़हब,रंग से हट कर बनी है करबला