
पीपीपी मोड पर देने के बाद भी अटक रही पीएचसी की सांसे
जोधपुर. पीपीपी मोड पर चल रहे दोनों शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (चांदना भाखर व राजीव गांधी कॉलोनी कच्ची बस्ती) पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह दोनों पीएचसी बंद होने के कगार पर आ खड़ी हुई है। क्योंकि 10-15 दिनों से इन दोनों स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक ही नहीं है। एक चिकित्सक का पीजी में चयन होने के कारण वह पीएचसी छोड़कर चला गया तो दूसरा सीएमएचओ की बेवजह की सख्ती का हवाला देकर। हालत यह हो गई है कि जिस एनजीओ (चित्रांश एजुकेशन वेलफेयर सोसायटी) को इसके संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे खुद ही इससे हाथ झिड़कना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने कलक्टर और सीएमएचओ को पांच पन्नों का पत्र भी लिख दिया है। पत्र में बंद करने की जो वजह बताई है वह भी बेहद चौंकाने देने वाली है। पीपीपी मोड पर चल रहे इन शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का संचालन किराए के भवनों में हो रहा है। दोनों पीएचसी पर 22 का स्टाफ भी एनजीओ का ही लगाया हुआ है। लेकिन सीएमएचओ ने अभी तक न तो साढ़े पांच महीनों का 3 लाख 25 हजार रुपए मकान का किराया दिया गया है और न ही दो महीने का छह लाख रुपए कर्मचारियों व चिकित्सकों का वेतन।
तीन साल तलाशते रहे किराए का भवन सरकार ने 2015-16 में जब इन दोनों (चांदना भाखर व राजीव गांधी कॉलोनी कच्ची बस्ती) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्वीकृति जारी की थी। तब चिकित्सा विभाग को इन पीएचसी के संचालन की जगह ही नहीं मिली। तीन साल गुजर जाने के बाद सरकार ने इन दोनों पीएचसी को भी पीपीपी मोड पर देने का फैसला कर लिया। इस साल जनवरी में इनको पीपीपी मोड पर दे दिया गया।
लेकिन अब नौबत वापस बंद होने की आ गई है। बिना चिकित्सक मरीजों का इलाज दिनोंदिन इन दोनों पीएचसी की हालत बेहद गंभीर होती जा रही है। दोनों पीएचसी में मिलाकर 22 कर्मचारियों का स्टाफ है।
इसमें दो चिकित्सक शामिल है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि पिछले 15 दिन से इन दोनों पीएचसी पर चिकित्सक ही नहीं है। यानी दोनों पीएचसी बिना चिकित्सक के संचालित हो रही है। चांदना भाखर में कार्यरत चिकित्सक का पीजी में चयन हो गया। इसलिए वह छोड़कर चला गया। जबकि दूसरे चिकित्सक ने सीएमएचओ की बेवजह की सख्ती का कारण बताकर छोड़ दी। चिकित्सक ही नहीं, कैसे चलाएंगे पीएचसी जिस एनजीओ ने इन पीएचसी के संचालन की जिम्मेदारी ली है।
उनके पास इसे चलाने के लिए चिकित्सक ही नहीं है। तो काम कैसे करेंगे। इसलिए हमने नोटिस भी दिया है। जो भी कटौती होगी। वह एमओयू के नियमों के तहत होगी। डॉ. एसएस चौधरी, सीएमएचओ पत्र लिखकर दे दी हिदायत मैंने पत्र लिखकर सीएमएचओ को हिदायत दे दी है। कलक्टर को भी इसकी प्रति भेजी है। ऐसा काम करने से क्या फायदा।
इससे अच्छा तो काम बंद कर दूंगा। भवन का साढ़े पांच महीने का साढ़े तीन लाख रुपए बकाया है। कर्मचारियों का दो महीने का छह लाख रुपए वेतन भी अटका हुआ है। अब तक नौ लाख रुपए जेब से खर्च कर चुका हूं। अनिल माथुर, एनजीओ संचालक
Published on:
11 Jun 2018 11:13 pm
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