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कृष्णभक्त रानियों और पासवानों ने बनवाए थे जोधपुर के ऐतिहासिक कृष्ण मंदिर

महाराजा अभयसिंह और विजयसिंह ने करवाया था सर्वाधिक वैष्णव मंदिरों का निर्माण

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कृष्णभक्त रानियों और पासवानों ने बनवाए थे जोधपुर के ऐतिहासिक कृष्ण मंदिर

फोटो मनोज सेन

नन्द किशोर सारस्वत

जोधपुर. जोधपुर में सर्वाधिक कृष्ण मन्दिरों का निर्माण महाराजा अभयसिंह और विजयसिंह के समय माना जाता है लेकिन जोधपुर की कृष्णभक्त महारानियों और महाराजाओं की पासवानों (उपपत्नियों ) ने भी वैष्णव धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा एवं भक्ति के चलते महाराजाओं से अधिक भगवान कृष्ण के मन्दिर बनवाएं । जोधपुर के कृष्ण मन्दिरों में कलात्मक तोरण बनाने की परम्परा भी रही है। राज रणछोडज़ी के मन्दिर का तोरण आज भी अपनी स्थापत्य कला के कारण सबको आकर्षित करता है । जोधपुर की रानियों की ओर से निर्मित मंदिर गंगश्यामजी , कुंजबिहारीजी मंदिर, रानीजी का मंदिर, तीजा मांजी का मन्दिर , राजरणछोडज़ी का मन्दिर , रसिक बिहारी (नैनीबाई) मंदिर, बाघेलीजी का मन्दिर इत्यादि आज भी आस्था का केन्द्र बने हुए है।

कुंजबिहारी मंदिर

जोधपुर के कटला बाजार में स्थित कुंजबिहारीजी का भव्य कलात्मक एवं ऐतिहासिक मंदिर महाराजा विजयसिंह ( 1751-1791 ई . ) की पासवान ( उप - पत्नी ) गुलाबराय ने 1779 ई . में बनवाया था । यह मन्दिर गुलाबराय के पुत्र शेरसिंह की स्मृति में बनवाया गया था । गुलाबराय वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित थी तथा उसने अनेक मन्दिर बनवाए थे । मन्दिर में दो भव्य तोरणद्वार बने हैं । गर्भगृह के बाहर की दीवारों पर भव्य भित्ति चित्रांकन किया गया है । इसमें कृष्ण भगवान के चरित्र , दीवारों पर रामलीला और कृष्ण लीला में देवकी - वासुदेव के विवाह , आकाशवाणी से भयभीत कंस , कृष्ण और राधा की रासलीला आदि घटनाओं के चित्रांकन है।

नैनीजी का मन्दिर ( रसिक बिहारी मन्दिर )

मेड़ती गेट के बाहर और उदयमन्दिर मार्ग पर रसिक बिहारी के मन्दिर का निर्माण महाराजा जसवन्तसिंह ( द्वितीय ) ( 1873-1895 ई . ) की पासवान नैनीबाई ने करवाया था । इसमें भगवान श्रीकृष्ण की ठाकुरजी की मूर्ति स्थापित है । रसिक बिहारी कृष्ण और उनकी आध्यात्मिक प्रियतमा देवी राधा को समर्पित मन्दिर 17 फुट ऊंची आयताकार चौकी पर बना है ।

गंगश्यामजी का मन्दिर

गंगश्यामजी का मन्दिर सर्वप्रथम राव गांगा ( 1515-1531 ई . ) की रानी देवड़ीजी ने करवाया था । इस मूर्ति की पूजा रानी देवड़ीजी स्वयं करती थी , जब राव गांगाजी के साथ विवाह हुआ , तब यह मूर्ति राव गांगा ने सिरोही महाराव से मांग कर अपने साथ ले आई। पहले यह मूर्ति किले में स्थापित की गई बाद में जूनी धान मण्डी में भव्य मन्दिर बनवाकर स्थापित की गई । राव गांगा ने यह मूर्ति स्थापित की इसलिए ये गंगश्यामजी कहलाए ।

राजरणछोडज़ी का मन्दिर

जोधपुर रेलवे स्टेशन के सामने स्थित राजरणछोडज़ी मन्दिर का निर्माण महाराजा जसवन्तसिंहजी ( द्वितीय ) ( 1873-1895 ई . ) की रानी राजकंवर जाड़ेचीजी जामनगर ने करवाया था । यह मन्दिर 1905 ई . में बनकर तैयार हुआ । इसके निर्माण में तत्कालीन समय में एक लाख से ज्यादा रुपये खर्च हुए । मंदिर की प्रतिष्ठा 12 जून 1905 को महाराजा सरदारसिंहजी ने की। भगवान रणछोड़ की प्रतिमा काले पत्थर की बनी है ।

रानीजी का मन्दिर -

सरदारपुरा बी रोड पर स्थित रानीजी का मन्दिर का निर्माण महाराजा सुमेरसिंहजी की रानी उमराव कंवर ने संवत् 1988 ( 1931 ई . ) में करवाया । इस मन्दिर में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति स्थापित है । रानी उमराव कंवर ने इस मन्दिर के निर्माण के साथ ही एक कृष्ण कुंज नोहरा और उसमें एक बेरा भी करवाया । संवत् 1988 ( 1931 ई . ) के माध सुदि 10 बुधवार को महाराजा उम्मेदसिंहजी के सानिध्य में इस मन्दिर में ठाकुरजी श्री राधेगोविन्दजी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की गई ।

मुरली मनोहरजी का मंदिर

मेहरानगढ़ में जनानी ड्योढ़ी के परकोटे और सलीमकोट के बीच यह मंदिर बना है । पूर्वमुखी इस मंदिर का निर्माण महाराजा विजयसिंहजी ने करवाया था । यह इमारत मंदिर न होकर एक महल था , बाद में महाराजा विजयसिंहजी ने अपने पिता महाराजा बखतसिंहजी द्वारा पूजित मुरली मनोहरजी की मूर्ति को इस महल में प्रतिष्ठापित कर इसे मुरली मनोहरजी के मंदिर का रूप दे दिया । मंदिर की देखरेख मेहरानगढ़ संग्रहालय न्यास द्वारा की जाती है । महाराजा बखतसिंहजी मुरली मनोहर की मूर्ति को अपने पास रखते थे। वे युद्ध अभियानों में भी यह मूर्ति साथ लेकर जाते थे ।