
ओमसिंह राजपुरोहित/बिलाड़ा (जोधपुर)। चौथी विधानसभा का चुनाव कालूराम आर्य ने परसराम मदेरणा के कहे अनुसार बिलाड़ा से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लड़ा। वे पांच वर्ष के अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा क्षेत्र में पांच बार भी नहीं गए। कार्यकाल समाप्त हुआ। 1972 में पांचवी विधानसभा का चुनाव इसी सीट से लडऩे के लिए परसराम मदेरणा ने फिर आर्य को ही कहा, लेकिन आर्य ने साफ मना कर दिया।
कारण पूछा तो बताया कि वे पूरे कार्यकाल में अपने क्षेत्र में गए ही नहीं और इस क्षेत्र के जाट-विश्नोई समुदाय उनसे नाराज है। परसराम मदेरणा अड़े रहे और कहा कि चुनाव तो तुमको ही लडऩा है। ना नुकुर नहीं चलेगी।
मदेरणा के सामने आर्य ने पांचवी विधानसभा का चुनाव लडऩे के लिए शर्त रख दी कि उन्हें अगर फिर चुनाव लड़ाना चाहते हैं तो रामसिंह विश्नोई को कांग्रेस में शामिल करें। मदेरणा को बात जमी नहीं क्योंकि रामसिंह विश्नोई इससे पिछले 1967 के चुनाव में मदेरणा के सामने स्वतंत्र पार्टी से भोपालगढ़ में उनके प्रतिद्वंदी थे।
मदेरणा के सख्त लहजे के आगे आर्य ने चुनाव लडऩे का मन तो बना लिया, लेकिन डर था कि वे अपने मतदाताओं के बीच क्या बहाना लेकर जाएंगे और उस दौर में पंचों-पटेलों के कहे अनुसार ग्रामीण वोट दे डालते थे। आर्य ने मदेरणा को रामसिंह विश्नोई के लिए मनाने को कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता मास्टर किशन लाल, सरपंच तुलसाराम एवं अन्य गणमान्य को मदेरणा के पास भेजा।
इस बीच आर्य ने रामसिंह विश्नोई को राजी कर लिया कि मदेरणा न्योता दे तो वे कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे। आर्य की मेहनत रंग लाई और आखिरकार मदेरणा, रामसिंह विश्नोई, दीवान माधव सिंह, खेतसिंह राठौड़ आदि नेताओं को एक साथ कांग्रेस में शामिल करने पर मान गए। इन सभी को समारोहपूर्वक कांग्रेस में शामिल कर लिया। उस समय हरिदेव जोशी मुख्यमंत्री बने। आर्य भी दूसरी बार चुनाव जीत गए।
आर्य बताते हैं कि परसराम मदेरणा ने उस चुनाव में अपनी सीट की परवाह न करते हुए , उनकी जीत के लिए 70 सभाएं ली। उनके पास मात्र दो ही जीप थी जबकि 4 जीप मदेरणा ने अपनी ओर से व्यवस्था करके भिजवाई। कई स्थानों पर जहां जीप नहीं जा सकती, मदेरणा और विश्नोई उनके साथ पैदल चल कर लोगों के बीच प्रचार करते।
Published on:
05 Nov 2018 07:45 am
