
जयकुमार भाटी
हमारे पारिस्थितिक तंत्र में गिद्धों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन राजस्थान सहित पूरे देश में पिछले पिछले एक-डेढ़ दशक में इनकी संख्या में भारी गिरावट हुई है। पहले गिद्धों के कम होने का कारण इंसानों को दी जाने वाली डाइक्लोफिनेक टेबलेट थी। जिस पर प्रतिबंध के बाद जानवरों को दी जाने वाली किटोप्रोफेन व एसिक्लोफेनाक दवा इनके लिए खतरनाक साबित हो रही हैै। हालांकि अब इन दवाओं पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
कारकस प्लांट हैं बड़ा कारण
अधिकांश गिद्ध बड़े शहरों में कारकस प्लांट के आस-पास व जोधपुर में मेहरानगढ़ किले के आस-पास पाए जाते हैं। 15 साल पहले तक इनकी संख्या 500 से ज्यादा थी, लेकिन वर्तमान में यह संख्या 200 से नीचे आ चुकी है। इनमें भी अधिकांश माइग्रेटरी गिद्ध हैं। भारतीय गिद्धों की संख्या तो महज 3 प्रतिशत ही रह गई है।
जानवरों को दी जाती हैं ये दवाइयां
किटोप्रोफेन और एसिक्लोफेनाक दवाओं और उनके फॉर्मूलेशन का उपयोग जानवरों में दर्द निवारक के रूप में होता है। यह दवा मृत पशुओं में भी रह जाती हैं और जब गिद्ध इन पशुओं को खाते हैं तो उनकी संख्या भी तेजी से घटती है। सरकार ने गजट नोटिफिकेशन में ड्रग एवं कॉस्मेटिक्स एक्ट में किटोप्रोफेन और एसिक्लोफेनाक को प्रतिबंधित कर दिया है।
अब संख्या बढ़ने की उम्मीद
सबसे पहले 2013 में डाइक्लोफेनिक पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। उस समय देशभर में जोधपुर में गिद्धों की संख्या सर्वाधिक थी। अब इन दूसरी दवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया है तो कुछ महीनों में सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।
डॉ. दाऊलाल बोहरा, गिद्ध विशेषज्ञ
Updated on:
02 Jan 2024 12:36 pm
Published on:
02 Jan 2024 12:34 pm
