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जोधपुर में आज भी जारी है सदियों पुरानी राव राजा बनने की परम्परा, 10 मार्च को होने वाले मेले को लेकर जुटे गेरिए

रंगों के त्योहार होली के नजदीक आने के साथ ही सूर्यनगरी के विभिन्न धार्मिक स्थलों एवं मोहल्ला समितियों ने रंगोत्सव की तैयारियां शुरू कर दी है। कृष्ण मंदिरों में भक्तिगीतों के साथ अबीर-गुलाल एवं पुष्प होरी की धूम शुरू हो गई है।

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rao raja fair at mandore area will be held on 10th march during holi

जोधपुर में आज भी जारी है सदियों पुरानी राव राजा बनने की परम्परा, 10 मार्च को होने वाले मेले को लेकर जुटे गेरिए

नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. रंगों के त्योहार होली के नजदीक आने के साथ ही सूर्यनगरी के विभिन्न धार्मिक स्थलों एवं मोहल्ला समितियों ने रंगोत्सव की तैयारियां शुरू कर दी है। कृष्ण मंदिरों में भक्तिगीतों के साथ अबीर-गुलाल एवं पुष्प होरी की धूम शुरू हो गई है। होली के दूसरे दिन रामा-श्यामा के दिन आयोजित होने वाली माली समाज की परम्परागत रावजी की गेर मेले को लेकर क्षेत्र के युवाओं व बुजुर्गों में उत्साह है।

इस बार 10 मार्च को आयोजित होने वाले रावजी के मेले के लिए रंग-बिरंगी पोशाकों के साथ लीक से हटकर दिखने के लिए गेरिए विशेष तैयारी में जुट गए हैं। युवक कांग्रेस के जिला सचिव लक्ष्मणसिंह सोलंकी ने बताया कि मेले के दौरान राव रूट में आने वाले मौहल्ले के बाहर स्वागत द्वार लगवाए जाएंगे। तोरणद्वार पर मोहल्लेवासी गेरियों व राव राजा का पुष्पवर्षा से स्वागत करेंगे।

सालों से चली आ रही राव परम्परा
मायली मंडावता बेरा के अध्यक्ष जगदीश गहलोत ने बताया कि मंडोर क्षेत्र की होली आज भी अनूठी और पारम्परिक है। क्षेत्रवासी सदियों बाद भी पुरातन परम्पराओं को दिल में संजोए हैं। इस मेले में हजारों की संख्या में मंडोर क्षेत्रवासी भागीदारी निभाते हैं। क्षेत्र के बुजुर्गों व इतिहाविदों के अनुसार मंडोर में जब 1442 में मुगलों का आक्रमण हुआ तब बालेसर क्षेत्र के कृषक राव हेमा की बहादुरी से खुश होकर तत्कालीन मंडोर शासक राव चूंडा ने मंडोर का कुछ भू-भाग राव हेमा को इनाम में दिया था। तभी से यह राव की परम्परा चली आ रही है।

एक दशक में 20 गुणा बढ़ी संख्या
खोखरिया बेरा के अध्यक्ष ब्रह्मसिंह गहलोत के अनुसार होली के दूसरे दिन आयोजित होने वाली राव की गेर में पिछले एक दशक के दौरान दर्शकों की संख्या करीब 20 गुना तक बढ़ी है। सोशल मीडिया में प्रचार प्रसार से लोगों में काफी जागरूकता आई है। यह पूर्णत: पुरुष प्रधान मेला ही है जिसमें महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। धुलंडी को दोपहर बाद सूर्य जब अस्तांचल की ओर बढ़ता है तब क्षेत्र की सभी बस्तियों में गेर समूह के सदस्य पारम्परिक परिधान धोती, साफा और अंगरखी में सजधज कर फागुनी गान, ढोल, चंग और घुंघरुओं की झंकार के बीच घेरदार नृत्य करते हुए रवाना होते है। गेर में तीन पीढ़ी एक साथ शामिल होती है। दादा, बेटा और पोता एक साथ नृत्य करते चलते हैं।

राव की गेर जब मंडोर उद्यान में पहुंचने के बाद रावजी के कुण्ड में कूदकर डोलचियों से पानी की बौछार करते है। ऐसी मान्यता है कि नाग कुण्ड के पवित्र जल से बीमार नहीं होते हैं। रावजी के चयन में मुख्य योग्यता नवविवाहित होना जरूरी है। इसके अलावा अच्छा नर्तक, बलिष्ठ और मजबूत कद काठी वाले युवा को राव बनाने के लिए प्राथमिकता दी जाती है। पीठ पर छापा लगने के बाद रावजी को गुलाबी रंग से सराबोर कर फूल पत्तियों से सजाया जाता है।

कहा जाता है कि होली के दूसरे दिन राव की भूमिका मंडोर क्षेत्र में फूलबाग बेरे के गहलोत निभाया करते थे। एक अप्रिय घटना के बाद सात बेरों के चौधरियों ने सर्वसम्मति से खोखरिया बेरा के गहलोत (नख-हरकावत) सदस्य को राव राजा बनने का अधिकार सौंप दिया जो आज भी जारी है। राव बनने वाले युवक को परम्परानुसार पंचामृत पिलाने के बाद हाथ में मुगदर थमा कर मंडावता बेरा वालों के संरक्षण में रवाना किया जाता है।

पूर्वजों के नियमों के अनुसार ही मेला
नागोरी बेरा के निर्मल कच्छवाह ने बताया कि राव महोत्सव की मुख्य विशेषता है कि सदियों बाद भी पूर्वजों के नियमों के अनुसार ही राव की गेर निकाली जाती है। कोई भी सामाजिक संस्था अथवा संगठन इसे अपने तरीके से मना नहीं पाया है। माली समाज के लोग ही अपने तरीके से मनाते है। अब यह मेला अनुशासित होने लगा है।

विवाहित ही बनता है राव राजा
राव की गेर में हमेशा क्षेत्र के नवविवाहित युवक का ही चयन किया जाता है। मंडोर के निकटवर्ती मंडावता मंदिर से खोखरिया बेरा, भवाला बेरा, भिंयाली बेरा, गोपी का बेरा, आमली बेरा, बड़ा बेरा, फतेहबाग बेरा पर बड़े बुजुर्गो की ओर से खोखरिया बेरा की गेर से शादीशुदा युवक के चयन की परम्परा है। इतना ही नहीं राव की सुरक्षा का दायित्व मंडावतों के बेरे वालों पर होती है। राव बनने वाला व्यक्ति घेरे में ही नाचता है वह चाहकर भी या थककर भी राव की पदवी नहीं छोड़ सकता है। डाका पांचम से वृद्ध, युवा और बच्चे उत्साह से रात्रि के समय होरियों का सामूहिक रूप से गायन करते है।

सिर्फ ढोल और घुंघरुओं की धुनें
राव गेर में राव राजा के ईर्द-गिर्द चंग की थाप पर गेर की टोलियां नृत्य व गीत गाते हुए साथ चलती है। किसी भी तरह के डीजे अथवा लाउड स्पीकर से कोई गीत नहीं बजाया जाता है। हजारों की भीड़ में सुनाई देती है तो सिर्फ ढोल ढमाकों की धुनें और पैरों में बंधे घुंघरुओं की आवाज।