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विलुप्त होने के कगार पर मरुप्रदेश की थारपारकर गाय

- बमुश्किल बची है 3 से 5 हजार गायें- अब पशुपालक व गोशाला संचालक जुटे संवर्धन में

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 विलुप्त होने के कगार पर मरुप्रदेश की थारपारकर गाय

विलुप्त होने के कगार पर मरुप्रदेश की थारपारकर गाय

जोधपुर. मरुप्रदेश की शान मानी जाने वाली थारपारकर गाय अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, जालोर व सिरोही जिलों में बहुतायत में पाई जाने वाली इस गाय की संख्या बमुश्किल तीन से पांच हजार रह गई है। ऐसे में पशुपालक व गोशाला संचालक अपने अपने स्तर पर इन गायों का संवर्धन-संरक्षण कर लोगों को जागरुक करने में जुटे हैं।

भीषण गर्मी व सर्दी को सहन करने की क्षमता वाली थारपारकर गाय के दूध व घी की काफी ज्यादा मांग रहती है। एक गाय प्रतिदिन १२ से १४ लीटर दूध देती है। पशुपालकों के मुताबिक थारपारकर गाय का दूध अमृत के समान है। इससे कई बीमारियां स्वत: ही ठीक हो जाती है।

नौसर गांव में हो रहा संवर्धन
जिले की फलोदी तहसील के नौसर गांव के पशुपालक रावलचंद पंचारिया पिछले पांच सालों से थारपारकर गायों के संवर्धन व संरक्ष्ण में जुटे हैं। उन्होंने सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च सेंटर (काजरी) के थारपारकर संवर्धन केन्द्र से थारपारकर नस्ल के दो नंदी लेकर काम शुरू किया था। आज उनके पास करीब दस थारपारकर गायें हो गई है। इन गायों के दूध व घी की मांग का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इसका घी १२०० रुपए और दूध ५० रुपए प्रति लीटर तक बिक रहा है।

इनका कहना....
जिले में कई निजी फॉर्म में पशुपालक थारपारकर गांयों का संवर्धन व सरंक्षण कर रहे हैं। यह गाय भीषण गर्मी व सर्दी को सहन कर जाती है। दूध उत्पादन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। दूसरी विदेशी किस्म की गाय गर्मी में हाफने लग जाती है। दूध का उत्पादन भी घट जाता है।
डॉ. सुभाष क च्छावाह, कृषि विज्ञान केन्द्र काजरी, जोधपुर

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