
विश्व थियेटर दिवस पर जेएनवीयू थियेटर सेल के विद्यार्थियों ने विभिन्न रस के भाव प्रस्तुत किए।
जोधपुर। शहर में संगीत नाटक अकादमी ऐसा स्थान है, जहां पर थियेटर से जुड़ी गतिविधियां बरसों से आयोजित हो रही हैं। यहां आए दिन नाटकों का मंचन होता है, कई थियेटर फेस्ट भी आयोजित किए जाते हैं। अकादमी की ओर से नाट्य प्रदर्शन के साथ-साथ नाट्य प्रशिक्षण भी दिया जाता रहा है। लेकिन वर्तमान में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय की थियेटर सेल में युवा अपनी अ भिनय कला को निखार कर देशभर में विशेष पहचान बना रहे हैं। वहीं शहर के कुछ युवा रंगकर्मी शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को रंगमंच से जोडने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
थिएटर सेल में 60 विद्यार्थियों ने सीखी अ भिनय कला
रंगमंच, नाट्य लेख, अभिनय की बारीकियां एवं निर्देशकीय कुशलता के प्रशिक्षण के लिए जेएनवीयू के पुराना परिसर में 5 फरवरी 2022 को थियेटर सेल का उद्घाटन कर डॉ. हितेंद्र गोयल कों निर्देशक बनाया गया। यहां दो साल में अब तक नाट्य एवं अभिनय की रुचि रखने वाले तीस-तीस विद्यार्थियों के दो बैच पूर्ण हुए हैं। विद्यार्थियों को भारतीय रंगमंच व पाश्चात्य रंगमंच धारणा, रियलिस्टिक एक्टिंग, नाट्यशास्त्र, भाव व रस जैसी वि भिन्न विधाओं का राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के एम. व्यास, विक्रमसिंह राठौड़ और डॉ. हितेंद्र गोयल प्रशिक्षण दे रहे हैं। सेल में 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स इन एक्टिंग स्किल्स भी चल रहा है। यहां प्रशिक्षण के दौरान लगभग 20 नाट्य विशेषज्ञ, लेखक, कवि व निर्देशकों के व्याख्यान से विद्यार्थियों ने अभिनय, फिल्म अभिनय, रंगमंच की छोटी-छोटी बारीकियों को सीखने के बाद नवाचार भी किया है। सेल के विद्यार्थी मनोज पंवार, अजय पंवार, मयूर, कुलदीप दीक्षित और राहुल ने मिलकर फोटोफाइल नामक एक शॉर्ट फिल्म बनाई। विक्रम और तुषार ने शॉर्ट फिल्म भूल बनाई, वहीं नीरज, अंश और जय ने शॉर्ट फिल्म आदत का निर्माण किया। ऐसे में यहां विद्यार्थी अपने अंदर छिपी हुई अभिनय कला को निखार कर देशभर में अपनी विशेष पहचान बना रहे हैं।
राजस्थानी भाषा में रंगमंच का अलग ही आनंद
रंगमंच और जीवन दोनों आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए है, दोनों में कोई फर्क नहीं है। रंगमंच ऐसी विधा है जिसमें आज का युवा अपने 2 से 3 वर्ष देकर अपना पूरा जीवन साध सकता है। युवा निर्देशक आशीष देव चारण को रंगमंच क्षेत्र से जुड़ाव विरासत में मिलने से राजस्थान की सबसे पुरानी रम्मत रंगमंच संस्थान में शुरूआती प्रशिक्षण प्राप्त किया और देशभर में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध नाट्य समारोह में अभिनय भी किया है। वे कहते है कि राजस्थान की मातृभाषा राजस्थानी में नाटक करने का अपना ही एक अलग ही आंनद है। यदि राजस्थान के रंगकर्मी ही राजस्थानी भाषा में रंगमंच नही करेंगे तो दूसरा कौन करेगा। उन्होंने बताया कि दूसरे प्रदेश में जाकर जब राजस्थानी भाषा में नाट्य प्रदर्शन करते है और नाटक के संवाद व कथा पूरी तरह से दर्शकों को समझ आने पर बतौर अभिनेता व निर्देशक बड़ा ही गर्व होता है। ऐसे में संस्थान की ओर से समय-समय पर नाट्य प्रशिक्षण शिविर आयोजित करके शहर के बच्चों और युवाओं को प्रशिक्षित करने का कार्य भी कर रहे हैं।
आशीष देव चारण, युवा निर्देशक, रम्मत रंगमंच संस्थान
आधुनिक रंगमंच में नाटक से जुडना जरूरी
आधुनिक रंगमंच में युवाओं का नाटक से जुड़ना बेहद जरूरी है। क्योंकि नाट्य प्रस्तुति से पूर्व की प्रक्रिया में विद्यार्थियों के व्यक्तिगत अनुभव शामिल होते हैं। इन अनुभवों को नाट्य प्रक्रिया में जोड़कर विद्यार्थी अपनी भावनात्मक कला का प्रदर्शन नाटक में कर पाता है। यह बात युवाओं की समालोचनात्मक सोच को विकसित करती है, जिससे उनमें निर्णय लेने और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। थियेटर केवल ब्लैक एंड व्हाइट में ही नहीं सोचता है, जबकि ग्रे शेड में भी सोचने के लिए तैयार करता है।
विक्रम सिंह राठौड़, एनएसडी एल्युमनी
सही दिशा एवं उचित मार्गदर्शन मिलना जरूरी
आज का युवा रचनात्मकता से सरोबार होने से उसकी ऊर्जा तीव्र गति से उसे संचालित करती है। ऐसे में रचनात्मक विद्यार्थियों को सही दिशा एवं उचित मार्गदर्शन मिलना जरूरी हैं। यदि वे रंगमंच और अभिनय की ऊंगली पड़कर भविष्य में रोजगारोन्मुखी ख्वाब देखते है तो रंगमंच न सिर्फ व्यक्तित्व का विकास करता है, बल्कि उसकी आवाज, मानसिक परिष्कार और उसके मनोविज्ञान को परिवर्धित कर समाज के लिए एक संपदा उत्पन्न करता है।
डॉ. हितेंद्र गोयल, निर्देशक, थिएटर सेल जेएनवीयू
Published on:
28 Mar 2024 10:43 pm
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