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P { margin-bottom: 0.08in; direction: ltr; }A:link { color: rgb(0, 0, 255); } कैराना के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने वालों के मुंह पर तमाचा, जरा इसे भी पढ़ लें

कानपुर के आजाद नगर में रहने वाली आशा और जाजमऊ की शबाना की दोस्ती गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।

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Ankur Singh

Jun 13, 2016

asha-shabana

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कानपुर
। नवाबों के जमाने से चली आई गंगा-जमुनी तहजीब का नजारा आज भी देखने को मिलता है। कुछ लोग भले ही देश को सांप्रदायिकता के अंधेरे में धकेल रहे हों, लेकिन उम्मीद की रोशनी दिखाने वालों की भी कमी नहीं है। इन दिनों हिंदू परिवार बड़ा मंगल मना रहा हैए वहीं मुस्लिम परिवार रमजान।


मगर कानपुर के आजाद नगर में रहने वाली आशा और जाजमऊ की शबाना की दोस्ती गंगाण-जमुनी तहजीब की मिसाल है। आशा पिछले दस सालों से रोजा रखती आ रही हैं तो शबाना इतने ही समय से कंपनी बाग चौराहे पर स्थित साईं मंदिर में भंडारा कराकर भूखे लोगों का पेट भर रही हैं। दोनों का मकसद है, आपसी भाईचारे का संदेश देना, गरीब लोगों की मदद करना। इतना ही नहीं दोनों ही सहेलियां एक दूसरे के त्योहार में शरीक होती हैं। परिवार के लोग भी एकण-दूसरे के यहां आते जाते हैं।


आशा और शबाना पेशे से वकील हैं। दोनों की मुलाकात 2006 में कचहरी में हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और दोनों एक दूसरे के त्योहार में शरीक होने लगीं। दीपावली में शबाना अपने घर में दीप जलाती हैं और आशा के साथ होली भी खेलती हैं। वहीं आशा भी ईद पर अपने घर में सिवइयां बनाकर लोगों खिलाती हैं और समाज में सौहार्द की मिठास घोलने का काम करती हैं। दे