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श्रृवण मास में आते हैं अश्वथामा, शिव की करते है अराधना

शिवराजपुर स्थित भगवान शंकर के मंदिर में भोर पहर चढ़ जाते हैं फूल, गांववालों को कईबार दर्शन दे चुका है द्धावर युग का यह मानव

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ashwathama worship in Saawan festival khereshwar temple shivrajpur

श्रृवण मास में आते हैं अश्वथामा, शिव की करते है अराधना

कानपुर। कहते हैं श्रृवण मास पर जो भी भक्त भगवान शिव की अराधना करता है, उसके सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। मंदिर पर जो भी माथा टेकता है उसकी मन्नत पूरी हो जाती है। इसी के चलते पिछले सैकड़ों साल से शिवराजपुर स्थित महाभारत कॉल के खेरेश्वर मंदिर में अश्वास्था आता है और भोर पहर पूजा-पाठ कर चला जाता है। पुजारी को हरदिन नए फूल शिवलिंग पर चढ़े मिलते है। इस रहस्य को खोजने के लिए देश ही नहीं विदेश से शोधकर्ता आ चुके हैं पर परदा नहीं उठा सके। ग्रामीणों का कहना है कि 25 फीट लंबा एक मानव रूपी छाया पहले दिखा करती थी। लोग डर के चलते सुबह घर से बाहर निकलने में डरते हैं। लोगों का मानना है कि भगवान कृष्ण के शाप से मुक्ति पाने के लिए गुरू द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वस्थामा शिव की आराधना करते आ रहे हैं। मीलों में फैला शिवराजपुर क्षेत्र महाभारत काल का अरण्य वन क्षेत्र माना गया है, जहां गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था। यहीं उनके महा पराक्रमी पुत्र अश्वथामा का जन्म हुआ था।
द्रोणाचार्य ने मंदिर का करवाया था निर्माण
शिवराजपुर में गंगा नदी से लगभग 2 किमी दूर स्थित है। महाभारत काल से सम्बन्धित इस मन्दिर के शिवलिंग पर,केवल गंगा जल ही चढ़ता है। मान्यता है कि मन्दिर को गुरु द्रोणाचार्य जी द्वारा बनवाया गया था और यहीं उनके पुत्र अश्वत्थामा का जन्म भी हुआ था। कहते हैं कि मन्दिर में रोजाना रात्रि में 12 से सुबह 4 बजे के बीच द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा पूजा करने के लिए आते हैं। महामंडलेश्वर स्वामी प्रखर जी महाराज ने बताया कि रात में मन्दिर बंद होने के बाद जब सुबह 4 बजे मन्दिर के पट खुलते हैं तो यहां स्थित मुख्य शिवलिंग पर जो सफेद फूल रखे जाते हैं, उनमें से एक फूल का रंग बदल कर लाल हो जाता है। मंडलेश्वर के मुताबिक माना जाता है कि यह फूल कोई और नहीं, बल्कि महान योद्धा गुरू द्रोणचार्य के पुत्र भगवान शिव की उपासना के दौरान चढ़ाते हैं।

गांववाले अश्वस्थामा के कर चुके हैं दर्शन
पहले शिवराजपुर का नाम खोडी फिर खेड़ी फिर “शिवखेरी“ और उसके बाद “खेरे“ रखा गया। खेरे के नाम पर ही यहां मौजूद ऐतिहासिक शिवमंदिर को.खेरेश्वर धाम नाम दिया गया। कहा जाता है कि इस मंदिर में विराजमान भगवान शंकर के शिवलिंग की 5 दिनों तक लगातार पूजा अर्चना करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। महाभारत के समय भगवान कृष्ण ने अश्वथामा को श्राप दिया था जिसके बाद से वह मोक्ष के लिए भटक रहा हैं। लोगों में ऐसी भ्रांतियां है कि आज भी अश्वथामा शिवराजपुरी के इसी मंदिर में भगवान शंकर की पूजा उपासना कर रहा है। इससे भगवान शंकर उसे मोक्ष प्रदान करें। खुद मंडलेश्वर ने बताया कि हमने भी कईबार ताजे फूल भगवान शिवलिंग में चढ़े पाए। वहीं गांववालों ने एक नहीं सैकड़ों बार अश्वस्थामा को देखा है।
महाभारत काल का है शिवलिंग
मान्यता है कि इसी स्थान पर पांडवों ने गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण की थी। मंदिर से कुछ.ही दूरी पर गुरु द्रोणाचार्य की कुटी भी थी। हालांकि मंदिर के स्थापना के संदर्भ में किसी को नहीं मालूम है। कानपुर के एक इतिहासकार मनोज कपूर के अनुसार इस मंदिर में मौजूद इस मंदिर में विराजमान भगवान शिव को खेरेश्वर भगवान के नाम से जाना जाता है। वहां के लोगों की मानें अश्वथामा श्रृवण माय पर्व पर नित्य प्रति खेरेश्वर धाम शिवमंदिर में भगवान शंकर की पूजा करने आता हैं। रात में मंदिर बंद करने के बाद सुबह जब मंदिर का पट खोला जाता हैं तो शिवलिंग पर बेल पत्र, फूल, अक्षत, भाँग धतूरा और केसर चढ़ी हुई मिलती है। कहा जाता है कि अश्वथामा ही रोजाना यहां भगवान शंकर की सबसे पहले पूजा करते हैं।
शिवलिंग पर आई दरार
खेरेश्वरधाम मन्दिर की उत्तर दिशा स्थित सड़क के कारण मन्दिर के चारों ओर बना नया आयताकार परिसर सन् 2005 में इस प्रकार निर्मित हुआ है कि पूर्वमुखी मन्दिर के चारों ओर की दीवारें समानान्तर ना होकर तिरछी बनी हैं। वर्तमान में चार शिव ***** के बीच स्थित सिर्फ मुख्य शिवलिंग ही पुराना है, जिसमें दरारें आ गई है। मन्दिर एवं मन्दिर परिसर सभी नवनिर्मित है। मंदिर के पुजारी के अनुसार रात को मन्दिर बन्द करने के पहले वह शिवलिंग को चन्दन लगाते हैं और सफेद फूलों से मुख्यशिवलिंग को सजा देते हैं। जब सुबह मन्दिर के पट खुलते है तो उसमें पूजा की हुई होती है। जल चढ़ा हुआ होता है। रात्रि में जो सफेद फूल रखे जाते हैं, उनमें से एक फूल लाल रंग में बदल जाता है। मन्दिर परिसर का पुराना और नवनिर्मित दोनों द्वार उत्तर दिशा में हैं और मन्दिर का मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व दिशा में है जो कि लाल रंग से रंगा हुआ है। मन्दिर से लगभग 100 फीट दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित बड़े आकार के गन्धर्व तालाब के कारण यह मन्दिर प्रसिद्ध है।

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