
कानपुर: हिंदी दिवस 2017: कविताओं की मिठास तो है बरकरार, पर भगवती चरण वर्मा का परिवार बदहाल
Hindi Diwas 2017: कानपुर. 'हम दीवानों की क्या हस्ती है आज यहां कल वहां चले, मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उड़ाते जहां चले', यह पंक्तियां कहते वक्त भगवती चरण वर्मा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि समाज और सरकारें उनके परिवार को वाकई दीवाना बना कर छोड़ देंगी। आज इस परिवार में दीवानगी के साथ धूल भी है, लेकिन मस्ती का कोई रुप नहीं दिखाई देता। गरीबी और मुफलसी के दौर से गुजर रहा कवि का परिवार का इन दिनों कानपुर के बिल्हौर तहसील में एक छोटे से मकान में रहता है। कवि के पोते रवि वर्मा कहते हैं कि बाबू जी को गुजरे जमाने हो गए, उनकी जयंती पर कुछ लोग आकर फोटो पर फूल चढ़ा कर चले जाते हैं। हमारी नजर उनसे कुछ कहना चाहती है, पर वो सिर कुछ सुनने को तैयार नहीं होते। कभी-कभार बाबू जी की दुनिया से जुड़े लोग आते हैं और कविताएं गुनगुना कर कुछ दर्द कम करने की कोशिश करते हैं।
हिमाचल भवन में 101 घंटे तक किया था नृत्य
हिंदी के पुरोधा, कलम के सिपाही या यूं कहें कि साहित्य के नायक भगवती चरण वर्मा के बारे में उपमाएं छोटी पड़ जाती हैं। भगवती चरण का जन्म उन्नाव शहर में हुआ था। बचपन से ही भगवती चरण वर्मा साहित्यिक मिजाज के थे। इसीलिये उन्होंने कलम को अपना हमसफर बना लिया। वक्त आगे बढ़ा तो भगवती का पहला उपन्यास पतन के नाम से सामने आया, जिसको पढ़कर लोगों ने जाना कि भगवती चरण साहित्य के क्षेत्र में एक नाम है। साहित्यिक मामलों के जानकार अविनाश यादव बताते हैं कि पिता की विरासत को उनकी कनुप्रिया मंजरी ने संभाली। अविनाश बताते हैं कि प्रख्यात कथक नृत्यांगना और लेखिका कनुप्रिया मंजरी कथक की दुनिया का एक ऐसा नाम है जिसके बनाये रिकार्ड को तोड़ पाना नामुकिन है। मंजरी ने हिमाचल भवन में 101 घंटे नृत्य करके ऐसी मिसाल बना दी कि पंडित जसराज को कहना पड़ा कनुप्रिया बड़ी ही सुंदर रुह है। हर मनुष्य शायद समझ न पाये लेकिन है वह है।
बाबू जी के बाद पिता की मौत के बाद टूट गया घरौंदा
हिन्दी साहित्य की दुनिया के बेताज बादशाह भगवती चरण शर्मा की मौत के बाद उनकी बेटी कनुप्रिया मंजरी उनके सपने को साकार कर रही थीं। इसी दौरान उनके पति चतुर्भज की मौत हो गई। भगवती चरण वर्मा के पौत्र रवि वर्मा बताते हैं कि पिता की मौत के बाद माता जी हमें लेकर गुड़गांव से लखनऊ आ गईं और नाते रिश्तेदारों से मदद की गुहार लगाई, पर किसी ने सहारा नहीं दिया। मां हमें लेकर कानपुर अपने पति के मित्र के घर आ गईं। पिता के दोस्त नेे हमें बिल्हौर में एक घर दिया और यहीं पर रहकर हमने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। मां, बच्चों और छात्रों को नृत्य और हिन्दी पढ़ाकर हमारा और अपना पेट पालती रहीं। इस दौरान हमारी मदद के लिए कोई नहीं आया। रवि कहते हैं जब हमारे बाबू जी जिंदा थे, तब उनसे मिलने के लिए गोपालदास नीरज, राजीव गांधी , हरिवंश राय बच्चन, राजेश खन्ना समेत नामचीन हस्तियां आया करती थीं, लेकिन उनके गुजर जाने के बाद हमें लोगों ने भुला दिया।
लव स्टोरी 1942 में निभा चुके हैं रोल, आज गुमनाम
सेंट जोवियर दिल्ली से फिल्म मेकिंग में डिप्लोमा करने वाले रवि ने लव स्टोरी 1942 में एक छोटा सा अभिनय भी किया। इसके अलावा वह थियेटर के बेहतरीन कलाकारों में से एक रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य ही है कि वक्त कला और कलाकारों पर भारी पड़ गया। साहित्य से जुड़े इस नामचीन परिवार की आखरी लौ भी लगभग बुझने को है। हालांकि रवि के मन में विश्वास है कि एक दिन वह फिर वापस मुख्य धारा में लौटकर देश और साहित्य के क्षेत्र में कुछ अच्छा करेगा। लेकिन इसके लिये मदद का हाथ दूर-दूर तक नहीं दिखता। शायद इसी घबराहट और यादों के भंवर में फंसकर रवि वर्मा अपनी जिंदगी के दरवाजे दूसरों के लिये बंद कर देते हैं। रवि बताते हैं कि बाबू जी की चित्रलेखा रचना की ख्याति इतनी थी कि इस कृति को लेकर भारतीय सिनेमा ने फिल्म भी बनाई, जिसमें मीना कुमारी ने अभिनय किया। इसके बाद एक टेढे़-मेढ़े रास्ते अपने खिलौने, भूले-बिसरे चित्र वह फिर नहीं आई। सामर्थ्य और सीमा थके पांव जैसी रचनाओं से देश के लोग रुबरू हुए। रवि बताते हैं राष्ट्रपति वीवी गिरी ने हमारे बाबू जी को सन 1971 में पदम भूषण से सम्मानित किया था।
Updated on:
14 Sept 2017 01:55 pm
Published on:
14 Sept 2017 08:22 am
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