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निर्दयी अंग्रेज अफसर कर्नल नील ने कानपुर के बूढ़े बरगद पर 133 लोगों को लटकाया था, आज भी वह स्थल देता मूक गवाही

-कर्नल नील ने 133 लोगों को कानपुर के बूढ़े बरगद पर दी थी फांसी-सत्तीचौरा कांड व बीबीघर घटना से आक्रोशित थे अंग्रेज अफसर

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निर्दयी अंग्रेज अफसर कर्नल नील ने कानपुर के बूढ़े बरगद पर 133 लोगों को लटकाया था, आज भी वह स्थल देता मूक गवाह

निर्दयी अंग्रेज अफसर कर्नल नील ने कानपुर के बूढ़े बरगद पर 133 लोगों को लटकाया था, आज भी वह स्थल देता मूक गवाह

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
कानपुर. देश को आजाद कराने की चिंगारी भड़क उठी थी, चारो तरफ हाहाकार मचा था। उसी दौरान 7 जुलाई 1857 को जनरल हैवलाक ने कानपुर पर कब्जा कर लिया था। विद्रोही सैनिकों के भी खलबली मची थी। दरअसल सत्तीचौरा घाट में अंग्रेजी सेना पर गोलीबारी और बीबीघर की घटना से अंग्रेज सैनिक आक्रोशित थे। उस बीच भारतीयों पर अत्याचार और संपन्न परिवारों के साथ लूटपाट उनके स्वभाव में शामिल था। कानपुर का प्रत्येक नागरिक उनके लिए विद्रोही था, उन्हे वो नाना साहब का साथी मानते थे। इतिहासकारो के मुताबिक बिल्कुल सही संख्या तो नहीं लेकिन अनुमान जरूर लगाया गया हैं कि गोरे सैनिकों ने कानपुर के हजारों लोगों की जानें लीं।

25 जुलाई 1857 को कर्नल नील को कानपुर जिम्मा मिला

उस दौरान बीबीघर के अहाते में खड़े बरगद के पेड़ पर हुई घटना ने सबको हिलाकर रख दिया। बरगद की शाखाओं पर 133 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था। इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि जब सैनिक निरंकुश हुए तो उन्हें रोकने के लिए जनरल हैवलाक ने प्रोवोस्ट मास्टर नियुक्त किया। उसे स्पष्ट आदेश दिया कि अगर कोई सैनिक लूटमार करता दिखाई दे तो उसे उसी वक्त यूनिफार्म में ही फांसी पर चढ़ा दिया जाए। इसके बाद सैनिकों की अराजकता पर लगाम लगी। 25 जुलाई 1857 को हैवलाक कर्नल नील को कानपुर का प्रशासन सौंपकर लखनऊ चला गया था। कर्नल नील भारतीयों के लिए हैवान था। इतिहासकार बताते हैं कि नील के लिखे पत्र से उसकी सोच का अंदाजा लगता है।

कर्नल नील ने निर्ममता भरा लिखा था पत्र

उसने लिखा था कि मैं हिंदुस्तानियों को दिखा देना चाहता हूं कि उनके निर्मम कार्यों के लिए हम जो दंड उन्हें देना चाहते हैं, वह अत्यंत कठोर होगा। उससे उनकी रूह कांप उठेगी, जिसे वह कभी भूल नहीं पाएंगे। बीबीघर के फर्श पर जमे रक्त को नील हिंदुस्तानियों से साफ कराता था। जो इन्कार करते थे उन पर कोड़े बरसाए जाते थे। इसके बाद उन्हें फांसी दे दी जाती थी। उस वक्त सैन्य अधिकारियों को मुकदमा करने और फांसी देने का अधिकार था, जिसका वह गलत उपयोग करते थे। बीबीघर परिसर का वह बूढ़ा बरगद आज भी 133 लोगों के फांसी का मूक गवाह है, जिसने देखा था कि कानपुर के निरपराध नागरिकों को नाना साहब पेशवा का साथी होने और विद्रोह में हिस्सा लेने के कारण फांसी पर लटका दिया गया था।

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