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भिखारियों से हरेंद्र प्रताप को हो गई मोहब्बत, रोटी के साथ बच्चों दे रहे कलम-दवात

दिल्ली में कर रहे थे नौकरी, तभी भूख से दम तोड़ चुके बुजुर्ग को देख दिया रिजाइन और भिक्षा मांगने वालों को कराते हैं भरपेट भोजन और गरीब बच्चों के अंदर जला रहे शिक्षा की अलख।

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भिखारियों से हरेंद्र प्रताप को हो गई मोहब्बत, रोटी के साथ बच्चों दे रहे कलम-दवात

भिखारियों से हरेंद्र प्रताप को हो गई मोहब्बत, रोटी के साथ बच्चों दे रहे कलम-दवात

कानपुर। इनका मन ऐसी रूम वाले ऑफिस के बजाए झोपरियों में रहने वाले बच्चे व सड़क पर भीक्षा मांगने वाले बुजुर्गो पे जाकर अटक जाया करता था। जहां गरीबी के कारण बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लेने से वंचित रह जाते, तो वहीं भरपेट भोजन नहीं मिलने से कई लोग दम तोड़ देते थे। मन की बात को दिल व दिमाग में बैठाकर यशोदानगर निवासी हरेंद्र प्रताप लाखों की नौकरी छोड़ अपने कदम गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाने के लिए बढ़ा दिए। पांच साल के दौरान दो हजार से ज्यादा बच्चों को खुद के पैसे से स्कूलों में दाखिला दिलवाया तो वहीं हर सुबह साइकिल पर 25 लोगों का भोजन लेकर निकल पड़ते हैं। भिखारियों को भोजन तो बच्चों को कलम-दवात पकड़ा उन्हें शिक्षित कर रहे हैं।

मन होता था विचलित
पुलिस लाइन निवासी हरेंद्र के पिता यूपी पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात हैं। हरेंद्र बताते हैं कि जिस जिले में पिता की तैनाती होती, वहां पूरे परिवार को अपने साथ रखते थे। पिछले 30 साल से यूपी के 15 से ज्यादा जिलों में हमें रहने का मौका मिला। हर शहर में हमें सड़क पर भिक्षा मांगने वाले लोग और दुकानों में काम करते बच्चे मिलते, जिन्हें देखकर हमारी आंख में आंसू भर आया करते थे। घर आते और मां से भोजन बनवा कर उन्हें खिलाया करते तो पिता से लड़कर गरीब बच्चों के लिए कापी, पेंसिल मुहैया कराते। बीटेक की पढ़ाई के बाद दिल्ली में एक अच्छी कंपनी में जॉब मिल गई और जिंदगी बेतरीन तरीके से दौड़ रही थी।

तभी पड़ी नजर पड़ी और
हरेंद्र बताते हैं कि हम अपने रूम से आफिस जा रहे थे, तभी एक भिखारी सड़क के किनारे भूख से तड़प रहा था। उसे अस्पताल लेकर गए, लेकिन उसकी मौत हो गई। इसी के बाद हम रूम लौटे और वहीं से रिजाइन लेटर मेल कर सीधे कानुपर आ गए और भिखारियों को रोटी और गरीब बच्चों को शिक्षा देने के लिए जुट गए। हरेंद्र बताते हैं कि पिछले पांच सालों से वह हरदिन 25 भिखारियों के लिए घर में भोजन पकाते हैं और सुबह के वक्त साइकिल पर झोला लेकर निकल पड़ते हैं। झकरकटी, कानपुर सेंट्रल स्टेशन, मंदिर, मस्जिद के बाहर भिखारियों को भरपेट भोजन कराते हैं। बीमार होने पर उनका इलाज भी करवाते हैं। बुजुर्गो को वृद्धा आश्रृम ले जाते हैं।

तब पहुंच गए महोबा
हरेंद्र ने बताया कि झकरकटी में हमें महोबा निवासी बिरजू पासवान से मिलने का मौका मिला। वह पिछले दो सालों से भिक्षा के जरिए अपना और अपनी पत्नी को पेट पालते हैं। उनके तीन बेटों ने घर से निकाल दिया। हरेंद्र ने बताया कि हम महोबा गए और उनके बेटों से मिले और जमकर फटकार लगाते हुए बुजुर्गो को घर में रखने को कहा। पर वह तैयार नहीं हुए। हमनें तत्काल डीएम को फोन लगा दिया और पुलिस को बुलवा लिया। जेल जाने के डर से तीनों बेटों को अपने माता-पिता को रखना पड़ा। अब उनकी जिंदगी खुशहाल है। हरेंद्र अब तक 50 से ज्यादा भिक्षा मांगने वाले बुजुर्गो को उनके परिजनों को सौंच चुके हैं।

बच्चों को करा चुके दाखिला
हरेंद्र बताते हैं कि पिता जी भी अपनी वेतन से कुछ पैसा इस नेक काम के नाम पर देते हैं। वहीं पत्नी भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है और जो उन्हें मिलता है, वह पैसा गरीब बच्चों और भिक्षा मांगने वालों के लिए देती हैं। हरेंद्र भी कानपुर में प्राईवेट नौकरी करते हैं और इसी से अपनी इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। हरेंद्र बताते हैं इस कार्य को लेकर हमें लोगों के उपहास का सामना करना पड़ा लेकिन अपने ढृढ़ आत्मविश्वास के कारण तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे हैं। पिछले पांच साल के दौरान करीब एक हजार बच्चों को हरेंद्र सरकारी व प्राईपेट स्कूलों में दाखिला दिलवा चुके हैं और खुद के पैसे से शिक्षा के औजार में दिए हैं।

सप्ताह में बच्चों को खुद पढ़ाते
हरेंद्र बताते हैं कि शुक्रवार के दिन उनकी छुट्टी रहती है। परमठ स्थित गरीब बच्चों के लिए चलाए जाने वाले ट्यूशन क्लास में वह जाते हैं और उन्हें पढ़ाते हैं। इसके अलावा गुरूदेव टॉकीज के पीछे एक बस्ती में करीब 50 बच्चों को दोपहर 1 से 2 बजे के बीच निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहें हैं। हरेंद्र ने कहा कि हमारा सपना है कि एक भी बच्चा शिक्षित से वंचित न रहे। हरेंद्र कहते हैं कि गुरूदेव के पास रहने वाले बच्चे ***** पालिस, दुकानों में कार्य करते हैं। हमनें वहां के पार्षद से बात की है और कई बच्चों का सरकारी स्कूल में दाखिला भी दिलाया है।

भरपेट भोजन, हर बच्चा शिक्षित
ळरेंद्र हरेंद्र कहते हैं कि वह चाहते हैं कि भारत में भिक्षा प्रथा का खात्मा हो। एक भी इंसान को पेट की आग बुझाने के लिए दुसरों के आगे हाथ न बढ़़ाने पढ़े। हरेंद्र ने कहा कि केंद्र व राज्य सरकार को इस पर कानून बनाना चाहिए, जिससे कि सैकड़ों साल से चली आ रही इस बीमारी की इलाज हो सके। हरेंद्र कहते हैं कि सरकारें शिक्षा के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रूपए खर्च करती है, बावजूद आज भी अकेले कानपुर शहर में सैकड़ों बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं। सरकार को इस पर सही कदम उठाने की सख्त जरूरत है।