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कानपुर की पारसी बिरादरी : लड़कियां भी पहनती हैं ‘जनेऊ’, ऋग्वेद जैसा अवस्ता ग्रंथ

पूजा-पाठ का अधिकार सिर्फ अथोरनान पारसियों को, मृत्यु के बाद तीन दूत करते हैं आत्मा का फैसला

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आलोक पाण्डेय

कानपुर. भारत की सभ्यता में रच-बस चुके पारसियों के तमाम संस्कार हिंदुओं जैसे हैं। इस बिरादरी की लड़कियां भी ‘जनेऊ’ पहनती हैं। शादी से पहले गोद-भराई की रस्म होती है। हिंदू बिरादरी के ब्राह्मणों की तरह यहां भी अथोरनान वर्ण के लोगों को पूजा-पाठ का अधिकार है। मौत के बाद की कहानी भी हिंदू कहानियों जैसी है। फ्रवसी यानी आत्मा अमर-अजर है, लेकिन पुनर्जन्म नहीं होता है। अलबत्ता मृत्यु के बाद आत्मा को स्वर्ग-नर्क में भेजने का फैसला पैगंबर के तीन दूत करते हैं। यही दूत मृत्यु का संदेश लेकर धरती पर आते हैं।


अदिति की तीन संतानों से पारसी और हिंदुओं की उत्पत्ति

पारसियों के धर्मग्रंथ अवस्ता के अनुसार, आदिकाल में अदिति नामक महिला की तीन संतानों से पारसियों की उत्पत्ति हुई है। अदिति की तीन संतानों के नाम थे- अग्नि, आदित्य और आर्यमन। अग्नि को पूज्य माना गया, जबकि आदित्य यानी असुरा के वंशज पारसी हैं, जबकि आर्यमन के वंशजों के रूप में हिंदुओं की उत्पत्ति बताई गई है। हिंदू धर्मग्रंथ ऋग्वेद भी मनु-शतरूपा की संतानों के रूप में हिंदुओं की उत्पत्ति की व्याख्या करता है। बहरहाल, पारसियों में भी हिंदुओं की तरह चार वर्ण होते हैं। सर्वोच्च अथोरनान वर्ण के पारसियों को मंदिरों में पूजा-पाठ कराने के साथ-साथ विवाह, नवज्योत संस्कार जैसे धार्मिक अनुष्ठान कराने का अधिकार है। बेहदिन वर्ण के पारसी कारोबार करते हैं।


सात वर्ष के बाद नवज्योत, तभी बनते हैं सच्चे पारसी

हिंदू मान्यता के अनुसार, बगैर यज्ञोपवीत संस्कार धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लेना वर्जित है। इसी प्रकार पारसी बिरादरी में नवज्योत संस्कार होता है। यह संस्कार सात से 13 वर्ष की अवस्था में किया जाता है। इस संस्कार में किशोर-किशोरी को जनेऊ जैसा एक धागा धारण कराया जाता है, जिसे कमर में लपेटकर रखना होता है। लडक़ों को नवज्योत संस्कार के बाद से सादरी भी पहनना अनिवार्य होता है। सादरी यानी एक किस्म की बनियान, जिसके गिरेबानं पर विशेष डिजाइन बनी होती है। पारसियों में जनेऊ को कस्ती कहते हैं। सिर्फ बाल कटवाते समय और स्नान के समय कस्ती को उतारने की इजाजत होती है। दैनिक क्रियाओं के बाद मंत्रजाप करना भी होता है। नवज्योत संस्कार के बगैर किसी भी संतान को पारसी नहीं माना जाता है। उसे धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने की इजाजत नहीं होती है।


शादी से पहले गोद-भराई, सात फेरों के बाद आशीर्वाद

पारसियों की शादी के संस्कार भी काफी हद तक हिंदू रीति-रिवाज जैसे हैं। रिश्ता पक्का होने के बाद वर पक्ष के लोग लडक़ी के लिए जेवर, फल और कपड़े लेकर जाते हैं। इस रस्म को रुपिया पेहेरावानू कहते हैं। शादी के दौरान अथोरनान पारसी वर-वधू को अलग-अलग कुर्सियों पर आमने-सामने मुंह करके बैठा देता है। इसके बाद मंत्रोच्चार के साथ एक धागे को दोनों कुर्सियों के चारों तरफ सात बार घुमाकर बांध दिया जाता है। यह रस्म सात फेरों जैसी है। इस रस्म के बाद दूल्हा-दुल्हन का मुंह लोगों की तरफ कर दिया जाता है। अब आशीर्वाद समारोह होता है।


आग के साथ-साथ धरती और पानी की पूजा

पारसियों के लिए पर्यावरण का बड़ा महत्व है। इसी कारण अग्नि को मुख्य देवता मानने वाले पारसी धरती और पानी की पूजा भी करते हैं। पारसियों की पूजा में अक्षत (चावल), कुमकुम, फूल और धूपबत्ती का इस्तेमाल करते हैं। मृत्यु के बारे में पारसियों का यकीन है कि आत्मा अजर-अमर है, लेकिन किसी अन्य शरीर में दुबारा प्रवेश नहीं करती है। अंतिम समय में पैगंबर के तीन दूत मृत्यु का संदेश लेकर आते हैं। यही तीनों दूत धरती पर किए गए कार्यों के आधार पर फैसला करते हैं कि फ्रवसी (आत्मा) को स्वर्ग में भेजा जाएगा अथवा नर्क में।