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ध्वजा रोहण से हुआ था दंगा, तब से तकिया पार्क बना अखाड़ा

सीआईडी के अधिकारियों ने परेड चैराहे पर गाय काटे जाने की अफवाह फैला दी। अंग्रेज सरकार के पैसे में पलने वाले हिन्दुओं ने रामबाग में लोगों को भड़का दिया। 

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Akansha Singh

Aug 29, 2016

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कानपुर। गंगा-जमुना के बीच बसा कानपुर शहर एक जमाने में अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता था। लेकिन अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की रणनीति के तहत कानपुर शहर को दंगे की ओर ढकेल दिया। भगत सिंह को अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया। इसके विरोध में पूरे भारत में लोग अंग्रेजों के खिलाफ सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करने लगे।


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कानपुर में भी भगत सिंह की शहादत के बाद अंग्रेजों के खिलाफ लोगों ने बिगुल फूंक दिया। कलेक्टर जार्ज बेली ने कफ्र्यू लगा दिया। बावजूद लोग घरों से बाहर निकलकर अंग्रजों को चुन-चुन कर मार रहे थे। कलेक्टर बेरी ने इससे निपटने के लिए हिन्दू मुस्लिमों के बीच दंगा कराने के लिए सीआईडी को आदेश दिया। सीआईडी के अधिकारियों ने परेड चैराहे पर गाय काटे जाने की अफवाह फैला दी। अंग्रेज सरकार के पैसे में पलने वाले हिन्दुओं ने रामबाग में लोगों को भड़का दिया। फिर क्या था, जो लोग अंग्रेजों के विरोध में थे वह आपस में भिड़ गए और देखते-देखते विकराल दंगे का रूप धारण कर लिया।

दंगे की जानकारी जैसे ही गणेश शंकर विद्यार्थी को हुई तो वह अकेले लोगों को रोकने के लिए निकल पड़े। 25 मार्च 1931 को गणेश शंकर विद्यार्थी चैबे गोला तिराहे के पास पहुंचे और दोनों समुदायों को समझा रहे थे, तभी एक समुदाय के व्यक्ति ने विद्यार्थी के पीट पर छूरा घोप कर मौत के घाट उतार दिया। गणेश शंकर की मौत के बाद तीन माह तक कानपुर जलता रहा। कानपुर के समाज सेवियों ने दोनों समुदाय के बीच समझौता कराया। 1931 के दंगे में सरकारी अांकड़ों के अनुसार करीब तीन हजार लोगों की मौत हुई थी।]


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1975 में हुआ दूसरा सबसे बड़ा दंगा

1931 के बाद शहर में दूसरा सबसे बड़ा दंगा 1975 में तकिया पार्क में हुआ था। तकिया पार्क निवासी स्वदेश कुमार ने बताया कि पंद्रह अगस्त का दिन था। मोहल्ले के लोग पार्क में ध्वाजा रोहण के लिए इकठ्ठा हुए थे। तभी मोहल्ले के रमजानी सहित कई मुस्लिम समुदाय के लोग पार्क में आ धमके और ध्वाजा रोहण नहीं करने पर अड़ गए। हिन्दुओं ने जब जबरन तिरंगा फहराया तो सैकड़ों की तादात में ताकिया पार्क, शिवसहाय रोड, बजरिया, चमनगंज के मुस्लिम समुदाय के लोग पार्क में आ गए और दोनों तरफ से जमकर पत्थरबाजी हुई। प्रशासन ने तकिया पार्क में कफ्र्यू लगा दिया। एक माह तक पूरे इलाके पर कफ्र्यू लगा रहा, बावजूद जब दंगा नहीं शांत हुआ तो कैंट से आर्मी बुलानी पड़ी थी। इस दौरान दंगे की चपेट में आने से रमेश बाल्मीकि के बैटे कल्लू, गंगा साहू के भाई रघुबीर, अर्चना बाल्मीकि के पति दीपक बाल्मीकी की जान गई थी।

41 साल से नहीं फहराया गया पार्क में तिरंगा

तकिया पार्क में बने एक चबूतरे में झंडा फहराने के लिए 15 अगस्त 1975 को हिन्दुओं ने पोल गाढ़ दिया था। 1977 में तकिया पार्क के लोग एक बार फिर 15 अगस्त को ध्वजा रोहण के लिए सुबह के पहर निकले, लेकिन जैसे ही मुस्लिम समुदाय को इसकी भनक लगी तो वह मौके पर आकर विरोध करने लगे। हिन्दु अपने को घिरता देख पार्क से चले गए, लेकिन 16 अगस्त की सुबह करीब 4 बजे झंडा रोहण कर दिया। इसके बाद ऐसा दंगा भड़का कि पांच माह तक इलाके में सेना के तैनात करना पड़ा था। सरकार ने इसके बाद तकिया पार्क में तिरंगा फहराने पर रोक लगा दी। 41 साल से तकिया पार्क में तिरंगा नहीं फहराया जाता।


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तकिया पार्क में 39 साल से पीएसी तैनात
16 अगस्त 1977 के बाद से तकिया पार्क में सरकार ने पीएसी की एक प्लाटून तैनात कर दी। बावजूद शहर का यह इलाका कभी शांत नहीं रहा। 1990 से लेकर 2001 तक करीब छोटे बड़े मिलकार दो दर्जन से ज्यादा दंगे हो चुके हैं। तकिया पार्क निवासी आशीष सिंह ने बताया कि सड़क के दाएं हिन्दू तो बाएं मुस्लिम रहते हैं। दोनों समुदाय के लोग 1990 से लेकर 2016 तक कभी भी एक दूसरे के इलाके में नहीं आते। वहीं 1990 के दंगे में अपने बेटे को खोने वाले रज्जक ने बताया कि दंगाईयों ने ताकिया पार्क तिराहे के पास बेटे को जिन्दा पेट्रोल छिड़कर आग लगा दी थी। बाद में उसके शव को काटकर गटर में बहा दिया था। ऐसे कई परिवार मिले, जिन्होंने दंगे के दौरान अपनों को खो दिया।

2001 में पीसीएस अधिकारी को गवानी पड़ी थी जान

2001 में चैबे गोला चैराहे के पास एक समुदाय के लोगों ने गाय का सिर काटकर सड़क पर रख दिया था। जानकारी होने पर हिन्दू संगठनों ने विरोध किया तो परेड़ से दंगा शुरू हो गया। दंगा इतना भीषण था कि सेना के साथ अर्धसैनिक बल की कई टुकड़ियां परेड, चमनगंज, नई सड़क, बजरिया, यतीमखाने में तैनात करानी पड़ीं थी। फिर भी दंगाई नहीं मानें तो जिला प्रशासन ने गोली मारने का आदेश दे दिया। पीएसी की गोलीबारी में पांच मुस्लिम समुदाय के युवकों की मौत के बाद हालात और बिगड़ गए। तत्कालीन एडीएम सिटी सीपी पाठक पीएसी के साथ नई सड़क बड़ी मस्जिद के पास समाज सेविकों के बुलावे पर पहुंचे। एडीएम के साथ पीएसी को देख लोग प्रदर्शन करने लगे। एडीएम ने लोगों को समझाने के लिए बच सड़क पर खड़े थे, तभी मस्जिद से चली गोली उनके सीने में जा लगी अैर वहीं उनकी मौत हो गई।


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पीएसी ने दो दिन में हालात किए काबू में

पाठक की मौत के बाद नई सड़क, तकिया पार्क, चमनगंज, बेगमगंज, परेड इलाके में पीएसी ने सघन तलाशी अभियान चलाया। बजरिया निवासी अशरफ खान ने बताया कि पीएसी ने तब कई दर्जन निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, और सैकड़ों को जेल भिजवाया। कहा जाता है कि तब से लेकर 2016 तक इन इलाकों में दंगे नहीं भड़के। चमनगंज निवासी अफसाख उल्ला खां का कहना था कि अंग्रेजों ने हमारे शहर को ऐसा बांध दिया कि लाख कोशिशों के बाद भी हमारे दिन नहीं मिले। असफाख का मानना है कि 2001 के दंगे में सैकड़ों मुस्लिम युवकों को पीएसी ने मौत के घाट उतारा था। जिसके चलते आज भी यहां के लोग पीएसी के जवानों को देखकर भड़क जाते हैं।