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राजा ने रखी कान्हा के जन्म के दिन ‘कान्हापुर‘ की नींव

कानपुर का पुराना नाम कान्हापुर था, जिसे गंगा के किनारे बसे मोहल्ले को यहां के लोग पुराने कानपुर के नाम से पुकारते हैं। 

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Akansha Singh

Aug 25, 2016

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कानपुर। भगवान कृष्ण का जन्म आज के ही दिन मथुरा में हुआ था। उनके जन्म का कानपुर शहर का पौराणिक महत्व है। कानपुर का पुराना नाम कान्हापुर था, जिसे गंगा के किनारे बसे मोहल्ले को यहां के लोग पुराने कानपुर के नाम से पुकारते हैं। इतिहासकार राजेन्द्र दुबे के मुताबिक सचेंडी का राजा हिन्दू सिंह भादौह की मुहुर्त अष्टमी को नवाबगंज क्षेत्र के बैरी घाट स्थित गंगा स्नान के लिए आए थे। राजा को यह जगह बहुत पसंद आई और उन्होंने यहां पर आबादी बसाने के लिए ठान ली। उनके साथ सचेंडी के विद्धान पंडित शिवराम तिवारी भी साथ में थे। पंडित शिवराम तिवारी ने राजा को बताया कि, अगर आप कृष्ण जन्माष्टमी के दिन इस गांव को बसाएं तो बहुत अच्छे परिणाम निकलेंगे। राजा ने यजमान की बात मानकर भगवान कृष्ण के जन्म के दिन 213 साल पहले रात के 12 बजे इस शहर का नींव रखी और ‘कान्हापुर' नाम रखा।

धनश्याम सिंह ने बसाया शहर को

राजा हिन्दू सिंह ने कृष्ण जन्माष्टमी के दिन शहर का नाम कान्हापुर तो रख दिया, लेकिन गंगा के किनारे लोग रहने को तैयार नहीं थे। क्योंकि बरसात के साथ-साथ यहां पर उस समय कुख्यात डकैतों का राज चलता था। राजा ने रमईपुर के राजा घनश्याम सिंह को आदेश दिया कि आप अपनी एक सेना की टुकड़ी लेकर जाएं और वहां के डकैतों को खत्म करें। जिसके बाद राजा घनश्याम सिंह ने दो माह के अंदर यहां पर जंगल सहित आस पास डकैतों का आंतक खत्म कर रमईपुर, बिधनू, कुंदौली, जहानाबाद, घाटमपुर के लोगों को लाकर यहां पर बसाया।

649 मकानों में 2505 सदस्य ने रखे थे कदम

राजा घनश्याम सिंह ने कान्हापुर को एक बेहतरीन नगरी के रूप में गढ़ा था। उन्होंने सबसे पहले यहां पर गंगा के किनारे घाट बनवाया और फिर दो बड़े फाटकों का निर्माण करवाया। राजा ने इसी दौरान 649 मकानों की नींव रखवाई, जिसमें 2505 सदस्य रहने के लिए बाहरी गांवों से आए। राजा घनश्याम सिंह लोगों की रखवाली के लिए स्वतः तिवारी घाट के पास अपना एक महल बनवाया वहीं पर रहने लगे।

अदालती दस्तावेजों पर कान्हापुर ही दर्ज

राजा हिन्दू सिंह ने भगवान कृष्ण के भक्त थे। उन्होंने मथुरा की तर्ज पर कान्हापुर नगरी बसाने का निश्चय किया था। राजा ने सचेंडी के साथ ही रमईपुर, जहानाबाद, कन्नौज, फर्रूखाबाद, घाटमपुर, अकबरपुर सहित अनेक गांवों में भगवान कृष्ण के मंदिरों का निर्माण कराया था, जो आज भी मौजूद हैं। कान्हापुर नगरी का नाम भले ही बदलकर कानपुर रख दिया गया हो, लेकिन अदालती दस्तावेजों में आज भी कान्हापुर की मोहरें देखने को मिलती हैं।

चौक में दिखेगी बृज की सांझी की झलख

आर्यनगर स्थित कृष्ण मंदिर के पुजारी ने बताया कि कानपुर और ब्रज की पौराणिक कथाओं का साक्षी है, शहर का सबसे घना इलाका चौक है। चौक में ही 1660 में बांकेबिहारी, रूक्मिणी मंदिर का निर्माण कराया गया था। भादौह में पूर्णिमा से अश्विन की अमावस्या तक यहां सांझी महोत्सव मनाया जाता है। ब्रज की भूमि और राजस्थान में भद्रपद शुक्ल 15 से अश्विन कृष्ण आमावस्या तक सांझी उत्सव में डूब जाता है। इसमें कुंवारी कन्याएं मिट्टी की वेदी पर कच्चे रंगों से कृष्ण की लीलाओं का चित्रण करती हैं। लकड़ी और मिट्टी के सांचे से मनोहारी दृश्य वेदी पर उकेरे जाते हैं। संध्या के समय पर अराधना होती है और युवतियां लोक गीत गाती हैं।