
मिलों के हूटर पर दौड़ता था शहर, PM मोदी ने बिक्री पर लगाई मुहर
कानपुर। गुजरात के बतौर सीएम नरेंद्र मोदी शंखदान रैली की शुरूआत 2013 में कानपुर से की थी। कल्याणपुर स्थित मैदान में लोगों ने जनसैलाब उमड़ा था। मजदूर, किसान, बेराजगार और हजारों अन्य लोग मोदी को सुनने के लिए पहुंचे थे। रैली के दौरान उन्होंने कहा था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनेगी तो एशिया का मैनेस्टर फिर से दहाड़ेगा। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए और यूपी में भाजपा की सरकार भी सत्ता में आ गई, लेकिन मिलों का शहर गुलजार नहीं हुआ। अब एक खबर ने मजदूरों के शहर को रूला दिया। जिस लाल इमली के हूटर पर शहर दौड़ता था, अब वह जल्द ही इतिहास के पन्नों दफन हो जाएगी। ऊनी कपड़ों की बेजोड़ इकाइयां लाल इमली और धारीवाल समेत देश भर के 64 बीमार सार्वजिनक और निगम उपक्रमों को बंद करने पर सैद्धांतिक सहमति हो गई है। केवल घोषणा की औपचारिकता शेष रह गई है। इसके बाद यहां की मशीनों का ***** थम जाएगा। छह जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट की बैठक में बीमार उपक्रमों को बंद करने का सैद्धांतिक फैसला हो गया है। यहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास बनाए जाएंगे।
अब नहीं निकलेगा चिमनियों से धुआं
सूती कपड़ों के उत्पादन और गुणवत्ता में देश-विदेश में कभी धमक रखने वाली यहां की कपड़ा मिलें अब अतीत के पन्नों में गुम हो जाएगीं। जिन कपड़ा मिलों के लिए कानपुर को उत्तर भारत के ’मैनचेस्टर’ का दर्जा प्राप्त था और यहां की एल्गिन मिल से तैयार तौलिये की तारीफ अमेरिका के होटलों में हुआ करती थीं। सुबह के वक्त मजदूर पैदल टोली बनाकर मिलों में काम करने के लिए जाया करते थे, लेकिन लाल फीताशाही और राजनेताओं के चलते मिलों में पिछले तीन दशक से ध्ुआं निकलना बंद कर दिया था। लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मजदूरों और आमशहरी को उम्मीद थी कि यह शहर फिर से दौड़ेगा, चिमनियों से धुआं निकलेगा पर ऐसा नहीं हुआ।
कांग्रेस के चलते बिक्री की आई नौबत
ब्रिटिश इंडिया कार्पोरेशन की इकाइयां कानपुर स्थित लाल इमली और पंजाब की धारीवाल मिलें पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बंद चल रही हैं। 60 नंबर लोई और गर्म कंबल के लिए विश्वप्रसिद्ध लाल इमली वर्ष 1992 से घाटे में चल रही है। वर्ष 2008 में उत्पादन न्यूनतम और वर्ष 2012 से उत्पादन पूरी तरह से बंद है। बीच-बीच में लाल इमली को दोबारा चालू करने के प्रयास की खबरें आती रहीं और मंत्रियों से मिल खोले रखने के आश्वासन मिलते रहे लेकिन केंद्र सरकार के मौजूदा फैसले के बाद सारी संभावनाएं समाप्त दिखाई दे रही हैं। भाजपा नगर अध्यक्ष सुरेंद्र मैथानी ने बताया कि कांग्रेस सरकार के गलत निर्णय के चलते कानपुर के अलावा देश की अन्य मिलों की हालत दहनीय है। लालइमली को चलवाए जाने के लिए हम पिछले तीन साल से लगे हुए हैं, लेकिन पूर्व मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद में इसे बंद करने की मांग की थी और इसी के बाद मिल चल नहीं पाई।
कैबिनेट में लिया गया निर्णय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट की बैठक बुलाई और बंद मिलों के बारे में जानकारी ली। इसी के बाद घाटे में चल रही व बंद मिलों की बिक्री का निर्णय ले लिया गया। अब लाल इमली की जमीन पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाए जाएंगे। नई गाइड लाइन के मुताबिक सितंबर 2016 को जारी डीपीई (डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंटरप्राइजेज) नियम को रिप्लेस करेगी। इसमें इकाइयों को समयबद्ध व चरणबद्ध बंद करने की प्रक्रिया, मंत्रालयों की जिम्मेदारियों का बंटवारा, कर्मचारियों के देयक भुगतान का उत्तरदायित्व आदि का निर्धारण किया गया है। कैबिनेट के मुताबिक, कर्मचारियों को वर्ष 2007 के वेतनमान के हिसाब से वीआरएस मिलेगा। गाइड लाइन की प्राथमिकता जमीन के उपयोग को लेकर है। बंद हो रही इकाइयों की जमीन का उपयोग अफोर्डेबिल हाउसिंग स्कीम के लिए किए जाने का प्रस्ताव है। यहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाए जाएंगे।
1862 में रखी गई थी नींव
कानपुर में सूती कपड़े की स्थापना 1862 में हुई थी, जो एशिया की पहली मिल कहलाई। श्हर की पहली कपड़ा मिल एल्गिन मिल के नाम से चालू हुई थी। कानपुर में सार्वजनिक क्षेत्र की ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) के अलावा निजी क्षेत्र की तमाम कपड़ा मिलें जब चलती थीं, तो यहां प्रतिदिन न केवल लाखों मीटर कपड़ा तैयार होता था बल्कि इनकी धड़धड़ाती आवाज के साथ मजदूरों की धड़कनें भी चलती थीं। इन मिलों में काम करना गौरव की बात होती थी। कानुपर की स्वदेशी कॉटन मिल में काम कर चुके रमेश प्रजापति (88) बताया ं कि गंगा के किनारे होने की वजह से यहां कपास का अच्छा उत्पादन होता था। इससे लाखों लोगों की रोजी-रोटी चलती थी। कहते हैं बीते तीन दशक में यहां एक के बाद एक मिलें बंद कर दी गईं। अब सुना है कि इन्हें पूरी तरह बंद कर वहां पर घर बनाए जाएंगे।
कभी डेढ़ लाख मजदूर करते हैं काम
एनटीसी में काम कर चुके उपेंद्र सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य के नेता एवं मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों का विकास कराने में लगे हैं। मिलों की परवाह किसी को नहीं है। एल्गिन मिल में काम कर राजू सक्सेना ने बताया कि जिनके ऊपर इन मिलों को चलाने की जिम्मेदारी है, अब वही इनकी जमीनें बिकवाकर कमाई के चक्कर में पड़े हैं। सुनहरे दिनों को याद करते हुए मजदूर रामरतन साहू ने बताया कि कपड़ा मिलों में हर दिन 11 लाख मीटर कपड़ा बनता था और करीब डेढ़ लाख मजदूर इन मिलों में काम करते थे। यहां की मजदूर युनियन की तूती पूरे देश में बोलती थी। साहू कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया और इसी के बाद एशिया के मैनचेस्टर की चिनमियों से धुंआ निकलना बंद हो गया। मिलें बंद होने के चलते हजारों युवा बेरोगजारी के चलते दूसरे राज्यों में कम पैसे में काम करने को मजबूर हैं।
Published on:
07 Jul 2018 09:02 am
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