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बसपा के इस कद्दावर नेता ने पलट दी बाजी, कन्नौज में डिम्पल यादव चुनाव हारीं

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बसपा के कद्दावर नेता निर्मल तिवारी भाजपा में हुए थे शामिल, पार्टी ने कन्नौज की दी थी जिम्मेदारी, मुलायम के गढ़ में खिलाया कमल का फूल।

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बसपा के इस कद्दावर नेता ने पलट दी बाजी, कन्नौज में डिम्पल यादव चुनाव हारीं

कानपुर। लोकसभा चुनाव में यूपी की हाई प्रोफाइल सीट कन्नौज थी। यहां पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डिम्पल यादव चुनाव के मैदान में थी तो उन्हें 2019 के सियासी अखाड़े में हराने के लिए भाजपा के सुब्रत पाठक एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए थे। मतदान से कुछ दिन पहले भाजपा ने बसपा के कद्दावर नेता निर्मल तिवारी को पार्टी में लाकर पूरी बाजी पलट दी और 1996 के बाद लोहिया के किले में कमल का फूल खिल गया। 2014 में डिम्पल की जीत के पीछे निर्मल तिवारी को मिले करीब एक लाख 27 हजार वोट मानें जा रहे थे, जो इसबार भाजपा के पक्ष में पड़े।

12 हजार वोटों से जीते पाठक
यूपी की वीआईपी सीटों में शुमार कन्नौज सीट पर भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक ने सपा उम्मीदवार डिंपल यादव को 12353 वोटों से पराजित कर दिया। पहली बार सांसद बने सुब्रत पाठक को 563087 वोट मिले। जबकि डिंपल यादव को 550734 मत मिले। चर्चित कन्नौज सीट पर 11 लाख 40 हजार 985 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इसमें से 8165 मत नोटा के खाते में भी गए। 2014 के चुनाव में कन्नौज सीट से डिंपल यादव 4,89,164 मत पाकर सांसद बनी थीं। तब उन्होंने सुब्रत पाठक को ही 19907 मतों के अंतर से हराया था। सुब्रत को 4,69,257 वोट मिले थे तो बसपा के निर्मल तिवारी को करीब एक लाख 27 हजार वोट मिले थे

कन्नौज से लड़े थे चुनाव
कानपुर शहर के आवास विकास, कल्याणपुर निवासी निर्मल तिवारी बसपा के ब्राह्मण चेहरा के तौर पर जाने जाते थे। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान निर्मन ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। निर्मल तिवारी बसपा के टिकट पर 2007 में विधानसभा का चुनाव लड़े और महज 672 मतों से उन्हें हार उठानी पडी। 2012 में निर्मल से चुनाव लड़े लेकिन इस बार भी मात्र 7621 मतों से सपा प्रत्याशी से हार हुई। 2014 में कन्नौज लोकसभा सीट से बसपा के ही टिकट पर सपा प्रत्याशी डिंपल यादव के खिलाफ चुनाव लड़े। 1,29,000 मत पाकर निर्मल तिवरी तीसरे नंबर रहे है। खुद भाजपा नेताओं ने भी 2014 में माना था कि यदि निर्मल तिवारी चुनाव के मैदान में नहीं होते तो मुलायम के किले में कमल खिल गया होता।

भाजपा ने कन्नौज का दिया प्रभार
भाजपा में शामिल होने के बाद निर्मल तिवारी को कन्नौज का चुनाव प्रभारी बनाया गया। करीब 4 लाख यादव तो साढ़े तीन लाख मुस्लिम और ढाई लाख दलित मतदाताओं वाली कन्नौज सीट पर भाजपा ने दलित और गैर यादव मतदताओं में सेंधतारी की जिम्मेदार निर्मल तिवारी का सौंपी। बसपा का कैडर सपा के बजाए भाजपा के साथ चला गया और डिम्पल को करारी हार उठानी पड़ी। रसूलाबाद विधानसभा के अलावा ब्राम्हण और दलित बाहूल्य बूथों में सपा के बराबर भाजपा को वोट मिले। निर्मल तिवारी ने इस जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली को अहम मान रहे हैं। निर्मल कहते हैं कि पीएम ने जात-पात के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं की सियासत खत्म कर दी और उनके बताए रास्ते पर हम जैसे कार्यकर्ता चल रहे हैं।

रसूलाबाद-बिधूना में खिला कमल
समाजवादी पार्टी के नेताओं को छिबरामऊ व कन्नौज विधानसभा क्षेत्र से सबसे अधिक उम्मीदें थीं। इन दोनों विधानसभाओं में उम्मीद के मुताबिक वोट नहीं मिले। सपा को रसूलाबाद व बिधूना विधानसभा से भी हार का सामना करना पड़ा। इससे सपा प्रत्याशी एक बार पिछड़ने के बाद दोबारा लीड नहीं बना सकीं। इस हार से सपा के नेता अब दबी जुबान में कहने लगे हैं कि बसपा का बेसवोट गठबंधन के बजाए भाजपा के साथ चला गया। रसूलाबाद और बिधूना में पार्टी को हार उठानी पड़ी। सपा नेता साहिल कहते हैं कि दलित वर्ग का वोट नही मिलने से डिम्पल यादव को हार उठानी पड़ी।

हार नहीं माने पाठक
छात्र राजनीति से सियासत की दुनिया में कदम रखने वाले सुब्रत पाठक ने अपने तीसरे चुनाव में सांसद बनने में कामयाबी हासिल की है। पा का दुर्ग बन चुके इस जिले में भगवा परचम लहराने के उनके संघर्ष का ही नतीजा था कि पिछले दो लोकसभा चुनाव में उनकी शिकस्त के बावजूद पार्टी ने उन पर भरोसा बरकरार रखा। 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव के मुकाबले तीसरे नम्बर पर रहे थे। 2014 के चुनाव में डिंपल यादव से उन्हें शिकस्त जरूर दी, लेकिन पाठक ने सपा के दुर्ग में दरार जरूर डाल दी। 2019 में भाजपा ने पाठक पर भरोसा जताया और टिकट देकर मैदान में उतार दिया। तीसरी कोशिश में सुब्रत पाठक को कामयाबी मिल गई और वह सपा के इस किला को फतह करने में कामयाब हो गए।