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पग-पग में बसे हैं दशरथ पुत्र प्रभु श्रीराम, इस अयोध्या की रखवाली करते हैं हनुमान

पुजारी ने बताया कि यहां की निकलने वाली शोभायात्रा प्रसिद है, जो पिछले डेढ़ सौ सालों से चली आ रही है...

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Lord Ram Temple in Rawatpur Kanpur UP news

पग-पग में बसे हैं दशरथ पुत्र प्रभु श्रीराम, इस अयोध्या की रखवाली करते हैं हनुमान

कानपुर. सैकड़ों साल फैजाबाद जिला स्थित भगवान श्रीराम की जन्मस्थल में विवाद चल रहा है। यहां प्रभु रामलला मंदिर के बजाए त्रिपाल में विराजे हैं, लेकिन कानपुर के रावतपुर इलाके की अयोध्या में प्रभु श्रीराम अपने पूरे परिवार के साथ मंदिर में विराजे हैं और इसकी रखवाली रामभक्त हनुमान करते हैं। यहां पर नवरात्र पर्व पर पूजा अर्चना का दौर चलता है और रामनवमी के दिन हजारों की संख्या में भक्त विशाल शोभायात्रा निकालते हैं, जो गली, मोहल्लों से होते हुए मंदिर पर आकर विधि-विधान से समापन करते हैं। शोभायात्रा संयोजक अवध बिहारी मिश्र ने बताया कि यहां पग-पग में प्रभु श्रीराम का वास है और मंदिर में हरदिन सैकड़ों भक्त आकर मन्नत मांगते हैं। पुजारी ने बताया कि यहां की निकलने वाली शोभायात्रा प्रसिद है, जो पिछले डेढ़ सौ सालों से चली आ रही है।

महारानी का करवाया था मंदिर का निर्माण

शहर के रावतपुर गांव में करीब डेढ़ सौ साल पुराना राममंदिर है। यहां भगवान श्रीराम अपने पुरे परिवार के साथ मंदिर में विराजे हैं। नवरात्र पव के अवसर पर मंदिर में सुबह से लेकर देररात तक भक्तों की तांता लगा रहता है। भक्त प्रभु श्रीराम के चरणों में वंदना कर मन्नत मांगते हैं। प्रभु राम अपने भक्तों की हर मुराद को पूरी भी करते हैं। शोभायात्रा संयोजक अवध बिहारी मिश्र ने बताया कि महाराजा रावत रणधीर सिंह का विवाह मध्य प्रदेश के रीवा में हुआ था। महारानी रौताइन बघेलिन जब विदा होकर आई तो अपने साथ सिंहासन पर विराजमान रामलला की मूर्ति भी लेकर आई। उन्होंने ही मंदिर की स्थापना कराई। मंदिर के सर्वराकार वीरेंद्र जीत सिंह हैं। यहां प्रभु के दर्शन को दूर- दूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं।

अयोध्या की भांति मंदिर का करवाया था निर्माण

शोभायात्रा संयोजक अवध बिहारी मिश्र बताते हैं कि महारानी रौताइन भगवान श्रीराम की भक्त थीं। विवाह के बाद वह भगवान रामलला की मुर्ति लेकर आई थी। सिंघासन में रामलला के साथ मां सीमा, पिता दशरथ, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन विराजे हैं। अवध बिहारी मिश्र कहते हैं कि महारानी प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए अयोध्या गई, लेकिन अंग्रज सरकार ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया। इसी से दुखी होकर उन्होंने अयोध्या की भांति भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण की अधारशिला रखी। कई माह तक मंदिर का निर्माण कार्य चला। वह ऐसा मिंइर का निर्माण करवाना चाहती थीं, जो दूसरा कहीं न हो, पर अंग्रेज शासकों के चलते उन्हें अपने पैर पीछे खीचने पढ़े। बावजूद मंदिर का नक्शा और बनावट पूरी तरह भगवान श्रीराम की अयोध्या की तरह ही है।

नवमी के दिन निकलती है शोभायात्रा

चैत्र शुक्ल नवरात्र की नवमी तिथि को श्रीराम नवमी महोत्सव समिति मंदिर परिसर से ही शोभायात्रा निकालती है। कल्याणपुर, पनकी, मसवानपुर समेत 25 से अधिक जगहों से लोग भगवान की झांकियां लेकर मंदिर पहुंचते हैं और फिर हजारों भगवा ध्वज लहराते हुए जय जय श्रीराम का उद्घोष करते चलते हैं। हवा में लहराते भगवा ध्वज और भक्तों की टोली शोभायात्रा में भगवान श्रीराम, भगवान विष्णु, हनुमान जी व अन्य देवी देवताओं की झांकियों पर पुष्प वर्षा करते हुए चलती है। शोभायात्रा संयोजक अवध बिहारी मिश्र का कहना है कि दिनोंदिन यह उत्सव भव्य होता जा रहा है। शहर मेस्टन रोड और लाठी मोहाल से भी श्रीराम नवमी पर भगवान की शोभायात्रा निकलती है। ऐसा लगता है मानों सभी देवी देवता देवलोक से धरा पर उतरकर भगवान श्रीराम और जानकी जी का स्वागत कर रहे हों।

यहां भी बढ़ गई दिलों की दूरियां

बाबरी कांड की आग से कानपुर की यह अयोध्या भी झुसली। पहले ***** और मुस्लिम भाई मिलकर रामनवमी के दिन मंदिर में एक साथ पूजा-पाठ के साथ मंदिर की साफ-सफाई करवाते थे। लेकिन अध्योध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद कानपुर में संप्रदायिक झड़प् हुई और इसी के बाद से दोनों समुदायों के बीच दुरियों बढ़ गई। लेकिन इलाके के लोगों ने दिज जोड़ने की कोशिश की, पर पिछले तीन सालों से रामनवमी के दिन शोभायात्रा के दौरान संप्रदायिक हिंषा हुई। इसी के बाद रामलला मंदिर में कुछ ही मुस्लिम भाई दिखाई दिए। अशरफ चच्चा कहते हैं कि सियासतदनों के चलते लोग बट गए, पर मंदिर से नहीं हटे। रामनवमी के दिन हम शोभायात्रा में शोमिल होते हैं और अराजकतत्वों के पत्थरों से कईबार घायल भी हो चुके हैं।