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कौरव और पांडव के बीच हुआ था युद्ध, ययाति की राजधानी से मिले पुख्ता सबूत

मूर्ति में साक्षत भगवान शिव की आकृति बनी हुई है।

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kanpur

कानपुर. रामसेतु कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है कि बात जिस तरह से वैज्ञनिकों के जरिए से आई है, उसी के बाद अब लोग मान रहे हैं कि महाभारत कपोल कल्पना नहीं, बल्कि कौरव-पांडवों ने दिल्ली-हस्तिनापुर में कई वर्षो तक राज किया था। ग्यारह साल पहले यहां खुदाई के दौरान ऐतिहासिक साक्ष्य मिले थे, जिनका परीक्षण करने के लिए पुरातत्व विभाग की टीम ले गई थी। जिसके जरिए पता चला था कि जाजमऊ महाभारत काल के राजा ययाति का नगर हुआ करता था। यहां इतिहास से जुड़ी कई इमारतें, मंदिर और मस्जिद हैं। सोमवार को गंगा के किनारे बसा यह क्षेत्र फिर से सुर्खियों में आ गया। क्योंकि गंगा की सफाई के दौरान जमीन के नीचे से अष्टधातु का शिवलिंग मिला, जिसे स्थानीय लोग हजारों साल पुराना बता रहे हैं। मूर्ति में साक्षत भगवान शिव की आकृति बनी हुई है। हलांकि स्थानीय प्रशासन अभी इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है।


11 साल खुदाई के दौरान मिले थे महाभारत युग के अवशेष
अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के जिए विख्यात जाजमऊ करीब छह हजार साल पहले महाभारत काल के राजा ययाति की राजधानी हुआ करता था। राजा ययाति ने यहां पर अपना महल बनवाया था जो आज भी गंगा के किनारे स्थित है। पुरातत्व विभाग ने करीब ग्यारह साल पहले जाजमऊ पुल की खुदाई 4500 वर्गमीटर के क्षेत्रफल में की तो उससे उस जमाने के तांबे के सिक्के, मुहरें, टेराकोट की वस्तुएं, मिट्टी के तरह-तरह के पुराने बर्तन, हड्डियों से बनने वाले सामान और कई बेशकीमती चीजें मिली हैं। जाजमऊ में महाभारत काल के ययाति शासन और उनकी नगरी होने का प्रमाण मिले थे। जिसके जरिए पता चला था कि जाजमऊ छह हजार साल पहले कभी महाभारत काल के राजा ययाति का नगर हुआ करता था। पुरातत्व के जानकार खुदाई में निकली दुर्लभ सामग्री को रेडियो कार्बन डेटिंग के माध्यम से तिथिबद्ध किया था। पुरातत्व विभाग के रिटायर्ट अफसर शिवकुमार रस्तोगी बताते हैं कि जो वस्तुएं खुदाई के बाद मिली थीं, उनका परीक्षण किया गया था और जो बात पता चलीकि महाभारत ग्रंथ कोई कपोल कल्पना नहीं है बल्कि कुरुक्षेत्र से लेकर दिल्ली-हस्तिनापुर में उस समय कौरव-पांडव का युग था।


कोयला घाट से निकला प्राचीन शिवलिंग
नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा किनारे की जा रही खुदाई के दौरान एक अतिप्रचीन शिवलिंग निकला है। खुदाई करने वाले श्रमिकों ने इसकी जानकारी घाट के महन्त और नमामि गंगे की कार्यप्रदायी संस्था को दी है। खुदाई का काम करने वाले श्रमिकों का दावा है कि शिवलिंग उन्हें लगभग तेरह मीटर की गहराई से प्राप्त हुआ है। श्रमिकों ने इस शिवलिंग को पास के शिवमन्दिर में रख दिया और इसे ईश्वरीय चमत्कार मानकर पूजा अर्चना शुरू कर दी। खुदाई करने वाले कर्मचारियो ने बताया की अचानक जेसीबी धसने पर खट खट की आवाज़ आई । कुछ ही देर में मशीन के साथ शिव मूर्ति सा दिखा मशीन ऊपर आने पर देखा शिव मूर्ति है । फिलहाल धरती के गर्भ से निकले शिवलिंग के दर्शन करने आसपास के गॉवों से श्रद्धालु पहुॅच रहे हैं। वहीं पुरातत्व विभाग के अफसर भी मंगलवार की शाम पहुंचे और उनका मानना है कि देखने में तो यह बहुत प्राचीन लगता है। शिवलिंग को जल्द ही परीक्षण के लिए ले जाया जाएगा।


महिलाएं उस समय भी करती थीं श्रृंगार
छह हजार साल से भी पुरानी सभ्यता वाले अवशेषों के बाद पुरातत्वविदों को यह पता लगाने का नया दायित्व मिला था कि मौर्य काल से पहले की सभ्यता क्या थी। खास बात यह है कि चार हजार ईशा पहले और छह हजार साल पहले के साक्ष्य मौर्य-शुंग और कुषाण कालों के हैं। यह सभी साक्ष्य-अवशेष केवल बीस वर्गमीटर एरिया में मिले हैं। यूपी राज्य पुरातत्व विभाग और बीरबल साहनी पुरावनस्पतिक संस्थान की इस नई खोज से पता चला है कि जाजमऊ में रहने वाली महिलाएं उस समय भी सौंदर्य के प्रति काफी जागरूक रहती थीं और सुंदरता निखारने के लिए बेशकीमती पत्थरों का प्रयोग करती थीं। पुरातत्वविद शिवकुमार रस्तोगी की मानें तो खुदाई के दौरान पथ्थर के कुंडल, बाले और बेहतरीन श्रृंगार की सामान मिले थे। इसी के बाद माना गया कि महिलाएं उस दौरान भी श्रृंगार करती थीं।


11 साल बाद निकला अष्टधातु का शिवलिंग
यह खुदाई जाजमऊ में राष्ट्रीय राजमार्ग 25 पर हुई और अवशेषों से यह भी पता लगा कि उस काल का सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन क्या था। खुदाई में 17 हजार से अधिक पुरानी दुर्लभ वस्तुएं मिलीं जिनमें ढाई इंच के स्त्री-पुरुष और पशुओं की आकृति भी है। मिट्टी निर्मित घरों, पकाए हुए ईटों के बने घरों में रसोई घर, स्नानघर और जलनिकासी की बेहतर व्यवस्था तब भी हुआ करती थीं। उस वक्त पुरातत्व विभाग की टीम इन अवशेषों को लेकर परीक्षण किया और माना था कि महाभारत युग था। यहीं 11 साल के बाद ययाति की राजधानी में खुदाई के दौरान शिवलिंग मिलने से स्पष्ट हो जाता है कि भगवान राम, कर्ण-अर्जुन और भगवान शिव कपोल कल्पना नहीं है।