
7 बार के विधायक की जनसेवा-इमानदारी पूंजी, किराए के मकान में आंखरी सांस ली
कानपुर। धनकुट्टी स्थित किराए के मकान में जिंदगी बिता रहे भगवती सिंह विरशाद (98) अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी यादें मौजूदा परिवेश में नेताओं के लिए मिसाल बन गई हैं। उन्होंने राजनीति को कमाई का जरिए नहीं बनाया, बल्कि जनसेवक के रूप में अपनी पहचान बनाई। विधायक रहते हुए वह बस से सफर करते तो गांव, मोहल्लों और कस्बों का दौरा बैलगाड़ी के जरिए करते। ग्रामीणों के साथ चैपाल लगाते और उनकी समस्याओं का निराकरण मौके पर करते। इसी के चलते गंगा-जमुना के लोग उन्हें गांधी के नाम से पुकारते थे।
नहीं रहे विशारद जी
आज जहां प्रधान, पार्षद सभासद, विधायक और सांसद बनने के बाद नेताओं के पास अचूक संपत्ति हो जाती है, वहीं उन्नाव से ं सात बार विधायक चुने जाने वाले धनकुट्टी निवासी पूर्व एमएलए भगवती सिंह विरशाद के पास अपना निजी मकान नहीं था। वह अपने छोटे बेटे के परिवार के साथ किराए के घर में जिन्दगी का आखरी सफर काटा। पिछले कईदिनों से बीमार चल रहे भगवती सिंह ने सोमवार को सरकारी अस्पताल में आखरी सांस ली। परिजन उनके पार्थिक शरीर को उन्नाव लेकर गए हैं और वहीं अंतिम संस्कार किया।
अंग्रेजों के खिलाफ भी लड़े
भगवती सिंह विरशाद का जन्म 30 सितंबर 1920 को उन्नाव जिले में एक मजदूर के घर में हुआ था। गांव में 5वीं तक की शिक्षा लेने के बाद भगवती जी कानपुर में अपने बाबू जी के पास आकर रहने लगे। इनके पिता अंग्रेज अफसर के घर में मजदूरी किया करते थे। पूर्व विधायक भूदर मिश्रा बताते हैं 1932 में अंग्रेज अफसर ने उनके पिता से मजूदरी करने को कहा, मना करने पर उनकी पिटाई कर दीै इस घटना के बाद 12 साल के विरशाद के दिल में फिरंगियों को लिए नफरत पैदा हो गई और क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए
बापू से हुई मुलाकात
कांग्रेस के पूर्व विधायक भूधर मिश्रा बताते हैं कि विरशाद जी 13 साल की उम्र में कानपुर के कपड़ा बाजार में मौजूद एक दुकान में काम करने लगे। कपड़ा बाजार में काम करने वाले कर्मचारियों का एक संगठन बनाया। फिर उनकी छुट्टी और काम करने के समय के लिए लड़े और उसमें कामयाब भी रहे। बताया, इसी दौरान एक कार्यकम्र में भाग लेने के लिए महात्मा गांधी कानपुर आए थे। तिलकहॉल उनकी मुलाकात बापू से हुई। महात्मा गांधी से मिलने के बाद विरशाद हिंसा के बजाए अहिंसा का रास्ता चुना और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में भाग लेने लगे। कईबार जेल गए।
पहला चुनाव हार गए थे
भगवती जी 1952 का विधानसभा चुनाव पीएसपी पार्टी से कानपुर के जनरलगंज सीट लड़ा था, लेकिन वह चुनाव हार गए। 1957 के विस चुनाव में पीएसपी पार्टी ने दोबारा से उन्नाव के बारासगवर सीट से चुनाव लड़ाया और जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना। 1962 के चुनाव में बारासगवर सीट से कांग्रेस कैंडिडेट देवदत्त ने विरशाद जी को हरा दिया। 1967 के चुनाव में इन्हें दोबारा जीत मिली। 1969 का विस चुनाव कांग्रेस के टिकट से लड़ा और विधायक चुने गए। ये जीत का सिलसिला 1974 में भी जारी रहा। साल 1977 में बीजेएस के देवकी नन्दन ने विरशाद जी को हरा दिया, पर 1980 और 1985 के चुनाव में फिर से जीत हासिल की। साल 1989 में देवकी नंदन ने फिर से हरा दिया। 1991 में अपने आखरी चुनाव में चैधरी देवकी नंदन को हराकर मैं 7वीं बार एमएलए बनें।
5 बेटे व एक बेटी
भगवती जी के 5 लड़के और एक लड़की है, जिसमे एक बेटे की मौत हो चुकी है। बड़े बेटे रघुवीर सिंह रिटायर्ड मास्टर दूसरे नंबर के बेटे दिनेश सिंह रिटायर्ड एयर फोर्स, नरेश सिंह रिटायर्ड प्राइवेट जॉब, रमेश सिंह रिटायर्ड टेलीफोन विभाग में है। बेटी की शादी हो चुकी है। उनके साथ एक भतीजा और तीसरे नंबर का बेटा नरेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते हैं। धनकट्टी निवासी अफजल बताते हैं कि मोहल्लेवालों ने चंदा कर उन्हें एक मकान देने का संकल्प लिया। पर भगवजी जी साफ इंकार कर दिया। इतना ही नहीं भगवती जी कभी-कभी ख्ुाद अपने हाथों से भोलन भी पकाते और बच्चों के साथ बैठकर खाते थे।
बैलगाडी से किया चुनाव प्रचार
पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्रा को आज भी विशारद जी का सानिध्य याद है। उनके अनुसार 1980 और 1985 में सदन में उनका साथ मिला। उनके घर जाते थे तो वह पेड़ा खिलाकर पानी जरूर पिलाते थे। उन्होंने पूरा जीवन सादगी से जिया। लोग उन्हें कितना पसंद करते थे, इसका उदाहरण उनकी सात बार की जीत है। बताते हैं 1957 के चुनाव के वक्त विरशाद जी के पास प्रचार करने के लिए कोई वाहन नहीं था। उन्होंने ससुराल से बैलगाड़ी मंगवाई। वह पांच छह कार्यकर्ताओं तक बैलगाड़ी में सवार होकर निकल जाते और जहां रात हो जाती वहीं रुक जाते और चैपाल लगाकर लोगों की समस्याएं सुनते और निपटाते।
Published on:
04 Dec 2019 09:03 am
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