शहर से दूर बारा सिरोही के एक आश्रम में कई नम आँखे किसी भी आने जाने वालों में अपनों को खोजती नज़र आती है। हर आहट में केवल एक ही सवाल जुबाँ से निकलता है कि जिनको पैदा किया, पाल पोस कर बड़ा किया, जिसकी एक सिसकी से रातों की नींद कुर्बान करने का मन करता था वो क्या इस लाचारी के हालातो में अपनी बूढी और जर्जर हो चुकी माँ को एक बार देखने आएगा, माँ के सर पर हाथ रख कर उससे उसका हाल पूछेगा।