26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

इन मांओं के लिए अभिशाप है मदर्स डे

कानपुर के स्वराज वृद्धा आश्रम में शहर और बगल के जिलों से आई बूढी और लाचार माँ अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिनों को बिता रही हैं।

2 min read
Google source verification

image

Abhishek Gupta

May 07, 2016

Mother In Kanpur

Mother In Kanpur

कानपुर.
शहर से दूर बारा सिरोही के एक आश्रम में कई नम आँखे किसी भी आने जाने वालों में अपनों को खोजती नज़र आती है। हर आहट में केवल एक ही सवाल जुबाँ से निकलता है कि जिनको पैदा किया, पाल पोस कर बड़ा किया, जिसकी एक सिसकी से रातों की नींद कुर्बान करने का मन करता था वो क्या इस लाचारी के हालातो में अपनी बूढी और जर्जर हो चुकी माँ को एक बार देखने आएगा, माँ के सर पर हाथ रख कर उससे उसका हाल पूछेगा।


कानपुर के स्वराज वृद्धा आश्रम में शहर और बगल के जिलों से आई बूढी और लाचार माँ अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिनों को बिता रही हैं। जिनके होनहारो और लाडलो ने माँ को बोझ समझ कर घर से बेघर कर दिया। इस आश्रम में लगभग 27 बूढी औरतें रहती हैं। जिनमें कई महिलाओं को या तो उनके लड़के बहू ने घर से निकाल दिया या फिर लड़कियों ने, जो बाद में फिर से माँ की ममता का एहसास तो कर रहे है, लेकिन माँ के लिए अपने कर्तव्यों को भूल चुकी है।


ऐसी ही एक 82 साल की कौशल्या देवी है जो लड़के का नाम लेने से ही घबराने लगती है क्योकि उनके लड़के की मार और गाली अभी भी उनकी यादों में घसीट ले जाते है। ये और बात है की जिस माँ को उनका लड़का मार पीट कर घर से बाहर निकाल रहा था उसकी परवरिश के लिए कौशल्या ने अपनी ज़िन्दगी दांव पर लगा दी थी। जवानी में कई बार पैर टूटने से कौशल्या अब चलने को लाचार है। पति के न रहने पर कौशल्या ने लोगो के घरों में चौका बर्तन साफ़ कर अपने लाडले की हर जरूरत को पूरा किया, लेकिन अब कौशल्या का बुढ़ापा आंसुओ के सैलाब में डूब चुका है।




ऐसे ही न जाने कितनी माँ हैं जिनकी कोख ने ऐसी औलादो को जन्म दिया और पालापोसा जो आज उन्हीं को बेसहारा करके चली गई। आर्थिक तंगी और अपनों की बेरुखी की मारी इन माँओं के लिए मदर्स डे एक अभिशाप की तरह है। ये सभी एक की इच्छा रखती है कि भगवान अब इनके जीवन को खत्म कर दे क्योकि इनसे अब अपनों की बेरुखी सही नहीं जाती।


वृद्धा आश्रम की संचालिका डॉ मंजू भाटिया का कहना है कि हम दो हमारे दो के परिवार की धारणा के बाद अब लोग अपने बच्चों की पढाई लिखाई तक सीमित रहते है। यही कारण है कि एक दशक पहले ऐसी बेसहारा महिलाओ की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी जिसमे वर्तमान में भारी वृद्धि हुई है। समाज में बन रहे इस नए ट्रैण्ड से सामाजिक ताने बने के टूटने का ख़तरा बढ़ा है, लेकिन ये तो कहा ही जा सकता है कि साल के 365 दिन न सही कम से कम एक दिन यानि मदर्स डे पर तो अपनी इन बेसहारा माँओं को सीने से लगा कर उनके बेटे देखें।