दस माह तक सुनवाई के बाद करीब चार सौ बीस करोड़ की इमारत पर एनजीटी ने चाबुक चला दिया और तत्काल निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।
कानपुर. अखिलेश सरकार के कार्यकाल के दौरान केडीए ने चिड़ियाघर के पास खाली पड़ी जमीन पर सिग्नेचर सिटी के निर्माण का निर्णय लिया। जिसका वन्यजीव से जुड़े समाजसेवियों ने विरोध किया, बावजूद इस पर रोक नहीं लगाई गई। इसी के बाद एनजीटी में आरटीआई एक्टिविस्ट अश्विनी यादव ने रिट दाखिल कर इसके निर्माण पर रोक लगाए जाने की मांग की। दस माह तक सुनवाई के बाद करीब चार सौ बीस करोड़ की इमारत पर एनजीटी ने चाबुक चला दिया और तत्काल निर्माण कार्य पर रोक लगा दी। आरटीआई एक्टीविस्ट अश्विनी यादव ने बताया कि केडीए ने मानकों को ताक पर रखकर वन्यजीवों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा था। एक वर्ष में कई दर्जन पक्षु-पक्षियों की इसके कारण मौत हो चुकी है। खुद जू डॉयरेक्टर दीपक कुमार और डॉक्टर आरके सिंह ने एनजीटी में आकर सिग्नेचर सिटी के खिलाफ बयान दर्ज करवाया था।
आरटीआई एक्टिविस्ट की दलील पर आया फैसला
चार इन्सानों और अनगिनत बेजुबान प्राणियों की जिन्दगी लील चुके पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के डीम प्रोजेक्ट सिग्नेचर सिटी पर आखिरकार एनजीटी की नजर टेढी हो गयी है। एनजीटी ने इसके निर्माण पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगा दी है। एनजीटी में एक आरटीआई एक्टीविस्ट अश्विनी यादव ने रिट दाखिल की कर बताया था कि सिग्नेचर सिटी बसाने के लिये पर्यावरण विभाग से एनओसी नहीं ली गयी है। इसके कारण इंसानों के साथ ही वन्यजीवों की मौत का सबब बन रहा है। केडीए ने एनजीटी में अपना पक्ष रखा, लेकिन जू के डॉक्टर के गवाही के बाद मामला आरटीआई एक्टिविस्ट के पक्ष में गया और इस प्रोजेक्ट के निर्माण पर रोक लगा दी।
दो साल पहले शुरू हुआ था निर्माण कार्य
सिग्नेचर सिटी का निर्माण 15 जुलाई 2016 में शुरू हुआ था। यह तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक था और इसकी नींव का पत्थर उनके हाथों रखा गया था। इसके लिये जिस स्थान का चयन किया गया वो कानपुर चिड़ियाघर से सटा हुआ था। कानपुर चिडियाघर की गिनती एशिया के विशाल वनक्षेत्रों वाले चिड़ियाघरों में की जाती है। 77 हेक्टेअर जंगल में फैले इस प्राणि उद्यान में इन्सानी घुसपैठ बेजुबान प्राणियों के लिये बहुत घातक साबित हुई। छह माह की अवधि मे कई प्राणियों की मौत हो गयी। कई रातों की नींद खराब हो जाने के कारण अपने कुदरती स्वभाव को खोकर चिड़चिड़े हो गये। कई वन्यप्राणियों का प्रजनन बन्द हो गया। इसी के बाद समाजसेवयों ने इस प्रोजेक्ट के निर्माण के रोक के खिलाफ सड़क पर उतर आए।
मानकों के विपरीत हो रहा था कार्य
एनजीटी में एक आरटीआई एक्टीविस्ट अश्विनी यादव ने बताया कि कानपुर प्राणि उद्यान के निदेशक दीपक कुमार ने इसके निर्माण पर रोक लगाए जाने के लिए सपा सरकार से गुहार लगाई थी। लेकिन केडीए के अफसर सपा सरकार के नेताओं को खुश करने के लिए मानकों में ताक पर रख कर सिग्नेचर सिटी का निर्माण कार्य करवाने के लिए जुटे रहे। अश्वनी बताते हैं कि पूरे छह माह तक सिग्नेचर सिटी का निर्माण कार्य 24 घंटे होता रहा। लाइन और तेज आवाज के चलते कई वन्यजीव की जान चली गई। हमलोगों ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो सत्ताधारियों ने हमें जान से मारने की धमकी, लेकिन हम बेजुबानों के लिए निडर होकर खड़े रहे और एनजीटी से न्याय मिला।
रैमको कम्पनी को मिला था निर्माण का ठेका
केडीए ने सिगनेचर सिटी को बनाने का ठेका हैदराबाद की रैमको कम्पनी को दिया था। चॅूकि इस साल विधान सभाचुनाव होने वाले थे और भाजपा की लहर महसूस की जा रही थी, इसलिये निर्माण की गति तेज की गयी। नतीजा यह हुआ कि निर्माण स्थल पर दुर्घटनाऐं होने लगीं। इसमें एक एक करके निर्माण कार्य में लगे तीन लोगों की बलि चढ़ गयी। इनमें एक सिविल इन्जीनियर भी शामिल था। इन्सानी जिन्दगी लीलने वाले घटनाओं की पुलिस जॉच हादसा बताकर खत्म कर दी गयी। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो न तो बिके और न डरे। उन्होने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया और जीत हासिल की।
1200 फ्लैट बनकर तैयार, जल्द मिलने वाले थे घर
बारह सौ फ्लैट वाली सिगनेचर सिटी का काम अपने अन्तिम दौर में पहुंच चुका है और जुलाई 2018 तक यहां लोगों को कब्जा दिया जाना है। अगर एनजीटी की रोक जारी रही तो सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ेगा जिन्होंने इस सरकारी परियोजना पर भरोसा करके अपनी जीवन भर की जमापूंजी एक आशियाना पाने की चाह में केडीए के हवाले कर दी है। क्या सरकार इस बात का जवाब देगी कि बिना एनओसी इस आवासीय प्रोजक्ट शुरू करने के दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कोई कार्यवाही की जायेगी। मामले पर केडीए उपाध्यक्ष के विजयेन्द्र पण्डीयन का कहना है कि एनजीटी ने जिन खामियों के आधार पर निर्माण पर रोक लगायी है, उन्हें जल्दी ही दूर करके दोबारा निर्माण शुरू कराया जायगा।