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पारसियों ने धूमधाम से मनाया नवरोज, जानिए इनके रीति-रिवाज

नवरोज के दिन रात साढ़े तीन बजे से खास पूजा-अर्चना होती है, लोग चांदी या स्टील के पात्र में फूल रखकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं 

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Hariom Dwivedi

Aug 18, 2016

kanpur

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पत्रिका सरोकार
लखनऊ. आज दो पर्वों का दिन है। रक्षाबंधन और पारसी समाज का नववर्ष। रक्षाबंधन को लेकर जहां हिंदू समाज में खूब उत्साह है वही उंगलियों पर गिने जाने वाले पारसी समाज को नववर्ष नव रोज को लेकर भी कम उत्साह नहीं हैं। अपनी शांतिप्रियता के लिए मशहूर पारसी समुदाय अपनी घटती जनसंख्या के लिए चर्चा में रहा है। पूरी दुनिया में लगभग एक लाख तीस हजार के करीब पारसी हैं। इनमें से लगभग 70 हजार भारत में रहते हैं। अपने धर्म की रक्षा के लिए आठ सौ साल पहले भारत आए इस समुदाय के लोग आज मुम्बई, पुणे, बैंगलोर और हैदराबाद के अलावा कानपुर और इलाहाबाद उप्र में भी रहते हैं। उत्तर प्रदेश में कानपुर और इलाहाबाद ऐसे दो शहर हैं जहां दर्जनभर से ज्यादा पारसियों के परिवार रहते हैं।

इलाहाबाद में फिरोजगांधी का परिवार
पारसी परिवारों से जुड़े टाटा, वाडिया और गोदरेज जैसे नामचीन पारसी परिवारों से इनके नाते रिश्ते हैं। इलाहाबाद में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का परिवार आज भी रहता है। करीब दो दर्जन पारसी इलाहाबाद में रहते हैं। इलाहाबाद के स्टेनले रोड पर एक पारसी कब्रिस्तान भी है। इसी जगह फिरोज गांधी की अस्थियों को दफन किया गया था। इलाहाबाद के पुराने लोग बताते हैं कि कभी इलाहाबाद के सिविल लाइंस इलाके में करीब 5 हजार पारसी रहते थे। पर बाद के सालों में वे देश से बाहर या बड़े शहरों में चले गए। पारसी अंजुमन इलाहाबाद में पारसी अंजुमन भी है। बहरहाल, धार्मिक नगरी इलाहाबाद में पारसियों के पुजारी रब्बी रहते थे। इनके जाने के बाद पारसियों को धार्मिक रीति रिवाज में बाधा आ रही है।

कानपुर में भी रहते हैं चार परिवार
चार से छह पारसी परिवार कानपुर में भी रहते हैं। यहां रहने वाले जमशेद सोहराब मिस्त्री और एसपी पटेल, फिरदौस पटेल और उनकी पत्नी दीप्ति बताते हैं कि 1380 ईस्वी पूर्व जब ईरान में धर्म परिवर्तन की लहर चली तो कई पारसियों ने अपना धर्म परिवर्तित कर लिया, लेकिन जिन्हें यह मंजूर नहीं था वे देश छोड़कर भारत आ गए। यहां आकर उन्होंने अपने धर्म के संस्कारों को आज तक सहेजे रखा है। नियम है कि पारसी समाज की लड़की किसी दूसरे धर्म में शादी कर लें तो उसे धर्म में रखा जा सकता है, लेकिन उनके पति और बच्चों को धर्म में शामिल नहीं किया जाता। ठीक इसी तरह लड़कों के साथ भी होता है। लड़का किसी दूसरे समुदाय में शादी करता है तो उसे और उसके बच्चों को धर्म से जुडऩे की छूट है, लेकिन उनकी पत्नी को नहीं। नववर्ष पारसी समुदाय में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। धर्म में इसे खौरदाद साल के नाम से जाना जाता है। पारसियों में एक वर्ष 360 दिन का और शेष पांच दिन गाथा के लिए होते हैं। गाथा यानी अपने पूर्वजों को याद करने का दिन। साल खत्म होने के ठीक पांच दिन पहले से इसे मनाया जाता है। इन दिनों में समाज का हर व्यक्ति अपने पूर्वजों की आत्मशांति के लिए पूजन करता है। इसका भी एक खास तरीका है। रात साढ़े तीन बजे से खास पूजा-अर्चना होती है। धर्म के लोग चांदी या स्टील के पात्र में फूल रखकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं।

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यूपी में पारसियों के अंतिम धर्मगुरु थे केशरी रुस्तम
केशरी रुस्तम पारसियों के अंतिम धर्मगुरु थे, जिनका कुछ महीनों पहले देहांत हो गया था। केशरी जी उत्तर प्रदेश में पारसियों के इकलौते धर्मगुरु थे। जमशेद सोहराब मिस्त्री ने बताया कि उनक मौत के बाद से पारसियों को अपने रीति-रिवाज निभाने में खासी परेशानी हो रही है।

नवरोज़ के पारसी पकवान
पारसी अपने खान-पान के लिए जाने जाते हैं। नवरोज के दिन हर पारसी परिवार फायर टेम्पल यानी अगियारी जाता है और नए साल के लिए प्रार्थना करते हुए चन्दन और लोबान की अगरबत्तियां जलाता है। नवरोज पर मावा केक नवरोज बड़े चाव से खाया जाता है। इसके अलावा नवरोज पर कई मांसाहारी व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें से सबसे ख़ास है पातरानी मच्छी। पुदीने और दही की चटनी में लिपटी, भाप पर पकाई गई साबूत मछली पारसी नव वर्ष के ख़ाने की जान है।

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