
बीजेपी के वटवृक्ष की जड़ में लगा रोग, खामोस पड़ा झाड़े रहो कलक्टरगंज
कानपुर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को बीमारी के चलते एम्स में एडमिट हैं। यह खबर जैसे देश में फैली शोक की लहर दौड़ गई। हर, जाति धर्म के लोग अपने प्रिय नेत के के स्वास्थ्य लाभ के साथ ही सलामती के लिए हवन-पूजन के साथ ही दुआ मांग रहे हैं। कानपुर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की फोटो के साथ काफी जगह हवन-पूजन किया और उनके जल्दी स्वस्थ्य होने की मनोकामना मांगी। वाजपेयी का उद्योग की नगरी से गहरा रिश्ता रहा है। 74/28 नंबर की गद्दी पर शाम को होने वाली बैठकी में अटल बिहारी अपने हम उम्र दोस्तों के साथ हंसी-ठहाका करते थे। अटल जी भी बात-बात में ‘झाड़े रहो कलक्टरगंज’ कहते थे। उनके बीमार हो जाने के बाद हटिया खुली बजाजा बंद, झाड़े रहो कलक्टरगंज खामोस है।
पीएम बनने के बाद आए थे कानपुर
जनसंघ के संस्थापकों में से एक अटल बिहारी का छात्र जीवन से ही कानपुर से गहरा रिश्ता था। तेरह दिन की सरकार में प्रधानमंत्री बनने के बाद वह सबसे पहले कानपुर आए थे। यहां उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर की के स्वर्ण जयंती समारोह का शुभारंभ किया था। अपने उस भाषण के बाद लोगों से बातचीत में उन्होंने कई बार कलक्टरगंज की यादों को भी ताजा किया था। राजनीति में सक्रिय होने के बाद वह जब भी कानपुर आए, स्वरूपनगर स्थित विहिप के प्रमुख पदाधिकारी रहे इंद्रजीत जैन के आवास पर ही रुकते थे। यहीं पर आजकल मुरली मनोहर जोशी रूका करते हैं। डीएवी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि अटल जी डीएवी कॉलेज में अपने पिता के साथ पढ़ाई के लिए आए थे। वह यहां लकभग चार साल रहे। आर्थिक स्थित टीक नहीं होने के चलते वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे।
तब जमानत गंवानी पड़ी
प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि डीएवी कॉलेज लाइब्रेरी में अटल जी के जीवन के कुछ अनसुनी कहानियां मौजूद हैं। प्रोफेसर बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी का मथुरा को लेकर राजनीति का एक खट्टा अनुभव भी रहा है। देश की आजादी के बाद लोकसभा के दूसरे आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। उनका यह पहला चुनाव था। इस दौरान मथुरा संसदीय क्षेत्र से ही देश की आजादी में अहम किरदार निभाने वाले राजा महेन्द्र प्रताप भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। देश के संसदीय इतिहास के पहले चुनाव में मात खा चुके राजा महेन्द्र प्रताप के सिर इस बार मथुरा की जनता ने कामयाबी का सेहरा बांध दिया। राजा महेन्द्र प्रताप के सामने अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी जमानत गंवानी पड़ी थी।
रसगुल्ले नहीं मिले तो पी गए चासनी
मूल रूप से आगरा के बटेश्वर क्षेत्र के रहने वाले कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षण कार्य के लिए ग्वालियर आकर शिंदे की छावनी के कमल सिंह के बाग में रहने लगे थे। यहीं पर उनकी पत्नी कृष्णा वाजपेयी ने अटल बिहारी वाजपेयी को जन्म दिया था। अटल की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा ग्वालियर में हुई। उन्होंने बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ग्वालियर के ही विक्टोरिया कालेज से प्राप्त की थी। ग्वालियर से वाजपेयी का करीबी नाता रहा है। वाजपेयी जब कानपुर में पढ़ा करते थे तो वह ग्वालियर के किस्से दोस्तों को खूब सुनाया करते थे। जब वह छोटे थे तो ग्वालियर के करहल गांव में बाबा जी ने यज्ञ किया। वाजपेयी जी भी पूरे परिवार के साथ वहां पहुंचे। लौटने में देर हो गई तो रात गांव में ही रुकना पड़ा। यज्ञ में जुटी भीड़ आसपास की दुकानों के खाने-पीने का सामान खत्म कर चुकी थी। भूख से व्याकुल वाजपेयी जी से एक दुकानदार ने कहा रसगुल्ले तो खत्म हो गए चासनी बची है। वाजपेयी जी ने कहा भाई चासनी ही लाओ। इसके बाद दोना भरकर वह चासनी पी गए।
पिता के साथ डीएवी में की पढ़ाई
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1946, 1947 में डीएवी पीजी कॉलेज में एडमिशन लिया और टॉपर बनकर निकले थे। डीएवी से ही उन्होंने एलएलबी का रिफ्रेशर कोर्स किया। खास बात यह रही कि अटल और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने एलएलबी के रिफ्रेशर कोर्स की कक्षाएं एक साथ पढ़ी थीं। पिता-बेटे डीएवी हॉस्टल के 104 नंबर कमरे में सादगी से रहते और खुद खाना बनाकर खाते थे। अपने कपड़े खुद धोते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने एमए राजनीति विज्ञान की पढ़ाई डीएवी के कमरा नंबर 20, 21 में की थी। जब एडमिशन लिया था, तब कलम, दवात रखने वाली मेज-कुर्सी थीं, जो आज भी हैं। इसको अटल जी की यादों से जोड़कर देखा जा रहा है।
गुरू को कभी नहीं भूले अटल जी
अटल बिहारी वाजपेयी का अपने शिक्षक डॉ. मदन मोहन पांडेय से गहरा लगाव था। जिस दिन गुरु क्लास लेने नहीं जाते थे, उस दिन अटल जी पुरानी साइकिल से 108/88 पीरोड गुरु जी के घर पहुंच जाते थे। जब गुरु नहीं मिलते थे तो उनकी पत्नी शारदा देवी से अनुमति लेकर घर के बाहर ही चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करने लगते थे। यह सिलसिला तब तक चलता, जब तक गुरु आ नहीं जाते थे। सक्रिय राजनीति में आने और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल गुरु को नहीं भूले। नवंबर 2001 में डॉ. मदन मोहन पांडेय की मृत्यु हुई, तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी थे। मदन मोहन के बेटे केके पांडेय ने बताया कि प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर डीएम आए थे और पिता के पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण किया था।
Published on:
13 Jun 2018 05:50 pm
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