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…जब गोरों के खून से लाल हो गया था सत्ती चौरा घाट

नानराव, तात्या टोपे, अजीमुल्ला समेत हजारों क्रांतिकारी अंग्रेजों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार रहे थे...

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Hariom Dwivedi

Aug 06, 2017

Satti Chaura Ghat

कानपुर. 1857 का विद्रोह आज भी लोगों को याद है। अंग्रेजों के खिलाफ हुए इस विद्रोह में कई क्रांतिकारी शहीद हो गए थे। इस जंग में नानराव, तात्या टोपे, अजीमुल्ला समेत हजारों क्रांतिकारी अंग्रेजों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार रहे थे। विद्रोहियों से बचने के लिए अंग्रेज छिपकर अपनी जान बचाने को मजबूर थे। अंग्रेज हार स्वीकार कर समझौते पर उतर आए थे। समझौते के तहत शहर में बाकी बचे अंग्रेज सैनिकों को सुरक्षित कलकत्ता निकलने के लिए सत्ती चौरा घाट पर 27 जून 1857 को 40 नावें मंगाई गई थी। अंग्रेज रवानगी के लिए पहुंचे तभी अंग्रेज फौज के कुछ सिपाहियों ने एकाएक गोलीबारी कर दी। इससे वहां मौजूद हजारों की भीड़ उग्र हो गई, जिसमें 450 से ज्यादा अंग्रेज मारे गए।

450 से ज्यादा अंग्रेजों का बहा था खून
अंग्रेज सरकार की क्रूरता के चलते 1857 में मेरठ में विद्रोह की ज्वाला भड़की थी, जिसकी आग कानपुर तक पहुंच गई थी। क्रांतिकारियों के लगातार हमलों से अंग्रेजों ने कानपुर छोड़ने का फैसला कर लिया था। 14 मई 1857 की दोपहर को सैकड़ों अंग्रेजी अफसर और उनके परिवार के सदस्य इलाहाबाद जाने के लिए नाव पर सवार हो रहे थे। घाट पर हजारों लोग मौजूद इस नजारे को देख रहे थे। तांत्या टोपे, बाजीराव पेशवा और अजिजमल भी यहां मौजूद थे, जबकि नानाराव पेशवा करीब 2 किमी दूर मौजूद थे। इस बीच गलतफहमी के चलते कुछ अंग्रेजी अफसरों ने गोली चला दी, जिसमें कई क्रांतिकारियों को गोली गई। इसके बाद क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के नाव पर धावा बोल दिया और अफसरों को एक-एक कर नीचे उतारकर मौत के घाट उतार दिया।

अंग्रेज महिलाओं को बीबीघर भिजवाया
इस कांड़ के बारे में विस्तार से प्रोफेसर सिंह बताते हैं कि अंग्रेजों ने यहां भी समझौते पर विश्वासघाट कर पहले हमला किया, जिसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी थी। क्रांतिकारी अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतराने के बाद जब महिलाओं का कत्ल करने को बढ़े तो नाना राव ने उन्हें रोका और सभी अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित सवादा कोठी भेज दिया था। इसके बाद देर रात सभी अंग्रेजी महिलाओं और उनके बच्चों को नाना राव **** के बीबीघर रहने के लिए भेज दिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए नाना राव ने हुसैनी खानम बेगम नाम की महिला और 2-3 सुरक्षा गार्ड लगाया था। यहां पर अंग्रेज महिलाओं के साथ अतिथियों की तरह व्यवाहार किया गया। उन्हें इलाहाबाद भेजने की तैयारी की जा रही थी, तभी अंग्रेज सैनिक सत्ती चौरा घाट का बदला लेने के लिए आ धमके।

अंग्रेज महिलाओं को गवानी पड़ी जान
सत्ती चौरा घाट पर हुए कत्लेआम से बौखलाई अंग्रेजी हुकूमत ने कानपुर को चारों तरफ से घेरना शुरू किया। बेगुनाहों को फांसी पर लटकाया जाने लगा। सत्ती चौरा कांड के बाद सैकड़ों क्रांतिकारियों को मारा गया। अंग्रेज सैनिकों की इस करतूत की सजा अंग्रेज महिलाओं को उठानी पड़ी। इनकी रखवाली कर रही हुसैनी खानम बेगम गुस्से से लाल हो गईं और वहां मौजूद चार अंगरक्षकों की मदद से 15 जुलाई 1857 को देर शाम बीबी घर में रह रही सभी महिलाओं और बच्चों के मौत के घाट उतार दिया। 16 जुलाई की सुबह इन शवों को कुएं में डाल दिया गया। बीबी घर कांड ने अंग्रेजों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। विदेशों में अंग्रेजों ने इसका पुरजोर विरोध किया। हत्याकांड का आरोप नानाराव पर लगाया गया कि उनके इशारे पर यह नरसंहार किया गया। नाना राव अंग्रजी हुकूमत के सबसे बड़े विलेन बन गए।

135 क्रांतिकारियों को बरगद पर लटकाया
बीबी घर कांड को लेकर इंग्लैंड में भारी आक्रोश था। वहां सड़कों पर होने वाले नाटक में नानाराव के पुतले को फांसी पर लटकाया जाता था। बढ़ते दबाब को देखते हुए अंग्रेजों ने कईबार नकली नाना राव को पकड़कर फांसी पर लटका दिया, लेकिन असली नाना राव कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे। इसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने करीब 135 क्रांतिकारियों को नाना राव Park में मौजूद बरगद के पेड़ पर एक साथ फांसी दे दी। यहां पर पुरातत्व विभाग ने अंग्रेजियत दर्शाने के लिए एक देवदूत की प्रतिमा लगाकर नक्काशीदार रेलिंग के साथ मेमोरियल वेल Park स्थापित कर दिया, जिसका नाम अब नाना राव Park है। गुस्साए क्रांतिकारियों ने यहां हमला बोलकर काफी कुछ तहस-नहस कर दिया। स्मारक को संरक्षित करने की अंग्रेजी कोशिशें नाकाम हुईं। अब बीबी घर के स्थान पर स्वीमिंग पूल, लाशों के कुएं पर स्केटिंग रिंग व बूढ़े बरगद के स्थान पर सिर्फ इबारत लिखा पत्थर लगा है।

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