1 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

kanpur Sawan News – जाजमऊ में भी है छोटी काशी, जाने इसकी अदभुत कहानी

सिद्धेश्वर मंदिर में सावन माह के दौरान लगता है भक्तों का तांता, पूरी होती हैं हर मनोकामना।

3 min read
Google source verification
sawan 2019 special story of siddheshwar temple in kanpur

kanpur Sawan News - जाजमऊ में भी है छोटी काशी, जाने इसकी अदभुत कहानी

कानपुर। भगवान शिव का प्रिय महीना सावन से शुरू हो गया है Sawan 2019 । जिसके चलते कानपुर के एतिहासिक सिद्धेश्वर मिंदर, Siddheshwar Temple जिसे छोटी काशी के नाम से जाना जा है, यहां सुबह से लेकर देरशाम तक भक्तों का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि भगवान शिव Lord Shiva की आराधना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं के पूर्ण होने के साथ जटिल से जटिल बीमारियां दूर हो जाती हैं।

सभी धर्मो के लोग लगाते हाजिरी
गंगा के किनारे बसे जाजमऊ Jajamou में प्रसिद्ध सिद्धेश्वर मंदिर Siddheshwar Temple है। भगवान शिव के दर पर हिन्दू और मुस्लिम मिलकर पूजा करते हैं। सावन माह के दौरान यहां पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं। मंदिर के पुजारी अुरूण पुरी के मुताबिक, कुष्ठ, टीबी , लकवा, लीवर, कैंसर सहित अन्य बीमारियों से ग्रसित मरीज आते हैं और बाबा सिद्धेश्वर के दर पर हाजिरी लगाते हैं। बाबा की कृपा से मरीज ठीक हो जाते हैं। पुजारी के मुताबिक यहां हिन्दू और मुस्लिम मिलकर मंदिर परिसर की देखरेख करते हैं। भक्तों को कोई दिक्कत न आए, इसकी व्यवस्था इन्हीं के हाथों में होती है।

मंदिर का इतिहास
सिद्धेश्वर मंदिर के पुजारी के मुताबिक भक्त इसे भारत की छोटी काशी के नाम से पुकारते हैं। पहले जाजमऊ देश की राजधानी हुआ करती थी। इसे राजा जयाद ने बसाया था। जयाद भगवान भोले के भक्त थे और उन्होंने भगवान शिव का तप किया था। खुश होकर शंकर ने उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा। जयाद ने भगवान शंकर से जाजमऊ में बसने की मन्नत की। भगवान शिव ने राजा को वरदान तो दे दिया, लेकिन एक शर्त रख दी। जिसे राजा जयाद की तपस्या को भगवान इंद्र ने खंडित कर दी इसी के चलते जाजमऊ को काशी का दर्जा नहीं दिला पाए।

जमीन से निकली शिवलिंग
मंदिर के पुजारी ने बताया कि राजा जयाद के पास एक हजार गायें थीं। इसमें से वो सिर्फ उस एक गाय का दूध पीते थे, जिसके पांच थन थे। जब ये गाय रोजाना एक टीले (किले से करीब दो किमी दूर, जहां आज ये मंदिर मौजूद है) पर जाती थी तो उसके थन से खुद-ब-खुद दूध गिरने लगता था। जब राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने टीले की खुदाई करवाई। यहां जमीन के नीचे एक शिवलिंग मिला। राजा ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और एक बड़ा यज्ञ कराने का ऐलान कर दिया।

इसलिए नहीं मिला काशी का दर्जा
पुजारी बताते हैं कि राजा ने पूरे विधि-विधान से इस टीले पर यज्ञ शुरू किया। जयाद ने 99 यज्ञ तो पूरे कर लिए लेकिन 100वें यज्ञ के दौरान उसे खंडित करने के लिए इंद्रदेव कौवे का रूप धारण करके यहां पहुंच गए। उन्होंने हवन कुंड में हड्डी डाल दी, जिस वजह से राजा का यज्ञ पूरा नहीं हो सका। इसके बाद राजा ने भगवान शिव की अराधना की। इससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन दिए। उन्होंने कहा कि ये इलाका काशी के रूप में तो नहीं जाना जाएगा, लेकिन यहां एक ***** स्थापित होगा, जिसे सिद्धेश्वर के काफी नाम से जाना जाएगा। हालांकि, इतिहास में ये वर्णित नहीं है कि इस मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई।

बहती है गंगा-यमुनी की तहजीब
जाजमऊ इलाका टेनरियों के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र की आबादी करीब छह लाख है, जिसमें 90 फीसदी मुस्लिम लोग रहते हैं। उनका कहना है कि इस इलाके में बसे भोलेनाथ उनके लिए शुभ हैं। जाजमऊ निवासी जावेद भाई मानते हैं कि यहां पर मकसूद बाबा की मजार और सिद्धनाथ मंदिर दोनों एक साथ मौजूद हैं। यहां रहने वाले मुस्लिम दोनों को ही अपना बाबा मानते हैं। यही वजह है कि आज तक इस मोहल्ले में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच झगड़ा नहीं हुआ है। इतना ही नहीं, जावेद खुद सावन के महीने में शिवलिंग के दर्शन करते हैं। बताते हैं कि सिद्धनाथ बाबा का आशीर्वाद हमेशा उनके साथ रहता है। यही नहीं, वे सिद्धनाथ बाबा को जाजमऊ का कोतवाल भी मानते हैं।

Story Loader