
कानपुर. फूलपुर और गोरखपुर में समाजवादी पार्टी की जीत के बाद यादव परिवार की रार कुछ हद तक खत्म होती दिख रही है। होली पर्व पर चाचा शिवपाल के पैर छूकर भतीजे अखिलेश ने आर्शीवाद मांगा और गिले शिकवे भुलाकर नेता जी की साइकिल को रफ्तार देने के लिए शिवपाल से सहयोग मांगा। चाचा ने वक्त की नजाकत को समझते हुए पुरानी बातें भुला अपने प्यारे अखिलेश के साथ राज्यसभा चुनाव में खड़े नजर आए। यादव परिवार के करीबी सामजवादी पिछड़ा प्रकोष्ठ के सचिव सियाराम यादव ने बताया कि समाजवादियों के बीच कभी विवाद नहीं रहा। हां कुछ गलत फहमियां थीं, जिन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और पूर्व मंत्री शिवपाल यादव ने दूर कर ली हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष अगर शिवपाल यादव को कन्नौज से चुनाव लड़ाते हैं तो वह जरूर लड़ेंगे और भारी मतों से जीतेंगे भी।
शिवपाल रामनाथ कोविंद के थे साथ
2016 में शुरू हुई चाचा-भजीते की जंग विधानसभा चुनाव 2017 तक जारी रही। इस दौरान शिवपाल यादव खुलकर अखिलेश के खिलाफ बोले और चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने सपा उम्मीदवारों के खिलाफ भीतरघात भी किया। राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त समाजवादी पार्टी कांग्रेस के उम्मीदवार की तरफ थी तो शिवपाल अपने बड़े भाई मुलायम सिंह के साथ खड़े नजर आए और रामनाथ कोविंद को वोट दिया। फिर भी अखिलेश यादव सब जानकर चुप रहे, वहीं पार्टी में महत्व नहीं मिलने के बावजूद शिवपाल ने दल नहीं बदला। जबकि भाजपा और कांग्रेस की तरफ से कई बार ऑफर आए पर मुलायम सिंह को छोड़ने को शिवपाल तैयार नहीं। जन्मदिन के पहले उनके समर्थकों ने खुलकर बोलना शुरू कर दिया था कि सैफई से चाचा शिवपाल अपनी नई सियासत की पारी का आगाज करेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं।
होली के बाद डिनर किया एक साथ
अखिलेश और शिवपाल गुट में नजदीकियां हाल के दिनों में बढ़ी हैं। इसकी बानगी राज्यसभा चुनाव से पहले आयोजित डिनर पार्टी में भी दिखी जब शिवपाल अखिलेश के बगल में मुस्कुराते नजर आए। उससे पहले कहा जा रहा था कि शिवपाल डिनर में शामिल नहीं होंगे, वो सैफई जा चुके हैं लेकिन सभी आशंकाओं को दूर करते हुए शिवपाल सिंह यादव ने नए संकेत दिए। इसके अलावा उन्होंने ट्वीट भी किया, ऊर्जा, उम्मीद और अनुभव से भरे समाजवादी धारा के साथियों के साथ रात्रि भोज। इसी के बाद समाजवादी पार्टी के नेता खुलकर तो कुछ नहीं बताते पर इशारों-इशारों में इतना जरूर कहते हैं कि भाजपा को पटखनी देने के लिए शिवपाल यादव लाव-लश्कर के साथ तैयार हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव यदि उन्हें कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने को कहेंगे तो वह जरूर मान जाएंगे। सूत्रों की मानें तो चाचा-भतीजा (शिवपाल-अखिलेश) के बीच सत्ता संघर्ष को दूर करने का यह बेहतर फार्मूला है। यानी अखिलेश लखनऊ में तो शिवपाल दिल्ली में राजनीति के केंद्र में होंगे।
डिंपल नहीं लड़ेंगी लोकसभा का चुनाव
अखिलेश यादव पहले ही एलान कर चुके हैं कि उनकी पत्नी डिंपल यादव अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी। ऐेसे में माना जा रहा है कि डिंपल की सीट यानी कन्नौज लोकसभा सीट से शिवपाल यादव को उतारा जा सकता है। कन्नौज सीट भी सपा परिवार के लिए सुरक्षित रहा है। यानी सुरक्षित तरीके से चाचा को संसद में लैंड करने की तैयारी अखिलेश ने कर ली है। हालांकि, शिवपाल के लिए संसद एकदम नया होगा क्योंकि वो अभी तक जसवंत नगर विधानसभा से लेकर लखनऊ और सैफई तक ही ज्यादा सक्रिय रहे हैं। अखिलेश यह भी ऐलान कर चुके हैं कि उनके पिताजी यानी मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से ही चुनाव लड़ेंगे। पिछली बार मुलायम सिंह ने आजमगढ़ से भी चुनाव जीता था। बाद में उनके पोते तेज प्रताप सिंह वहां से सांसद चुने गए।
अमर प्रेम थी जंग की वजह
साल 2016 के मध्य में सपा परिवार में कलह की शुरुआत हुई थी, जब अमर सिंह की पार्टी में दोबारा एंट्री हुई थी। कहा जाता है कि सत्ता के दो केंद्र होने की वजह से अखिलेश को सरकार चलाने में परेशानी हो रही थी। बाद में मुलायम सिंह ने शिवपाल को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया था। पिछले साल रिश्ते में तब और कड़वाहट आ गई थी जब अखिलेश पिता मुलायम सिंह को हटाकर खुद पार्टी का अध्यक्ष बन गए और चाचा शिवपाल यादव को भी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया था लेकिन कुछ दिनों पहले गोरखपुर-फूलपुर उप चुनावों में पार्टी की जीत और सपा-बसपा की नजदीकियों के बाद परिवार में भी सुलह की कोशिशें तेजी से आगे बढ़ रही हैं। सपा नेता सियाराम यादव कहते हैं कि समाजवादियों के बीच मतभेद करवाने में अहम रोल अमर सिंह का रहा। उन्हीं के चलते दोनों नेताओं के बीच दूरियां बढ़ गई, लेकिन अमर सिंह की सच्चाई जब सामने आ चुकी हैं।
Published on:
30 Mar 2018 07:33 am
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