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इच्छाधारी नाग व नागिन करते हैं इस शिव मंदिर की रखवाली, लगता है सांपों का मेला

शहर से 20 किमी की दूरी पर स्थित एक सैकड़ों साल एतिहासिक खेरेपति शिव मंदिर है, इसकी रखवाली इच्छाधारी नाग और नागिन करते हैं

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Ruchi Sharma

Sep 25, 2016

temple

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कानपुर. शहर से 20 किमी की दूरी पर स्थित एक सैकड़ों साल एतिहासिक खेरेपति शिव मंदिर है, इसकी रखवाली इच्छाधारी नाग और नागिन करते हैं। मंदिर के पुजारी के शिवराम शुक्ला मुताबिक इच्छाधारी नाग व नागिन साल में एक बार नागपंचमी के दिन इस में मन्दिर भोर सवेरे शिवलिंग की पूजा अर्चना करते हैं। विगत 200 वर्षों से प्रथम पूजा अर्चना इच्छाधारी नाग नागिन करते आ रहे हैं। पुजारी कहते है कि इसके बारे में उनके पूर्वज भी इसकी जानकारी देते थें और खुद ही शिवलिंग की पूर्ण पूजा उन्होंने देखी है। पर इच्छाधारी नाग नागिन के दर्शन करने में असफल रहे है। लेकिन आज भी प्रथम पूजा इच्छाधारी नाग नागिन ही करते है। जिनके स्वरूप की जानकारी किसी को भी नहीं है।

पुजारी ने बताया कि इस मंदिर में क्रांतिकारी नानाराव पेशवा का बहुत लगाव था। पेशवा हर सोमवार को पूजा के लिए आया करते थे। एकबार अंग्रेज सेना नाना को घेर लिया। वह किसी तरह से वहां से निकल कर सीधे खेरेस्वर शिव मंदिर आ गए और यहीं पर छिप गए। अंग्रेज सेना जैसे ही मंदिर के अंदर प्रवेश के लिए बढ़ती है उसी समय सैकड़ों नाग उनके सामने आ जाते हैं, डरकर अंग्रेज वहां से भागने को मजबूर हुए थे। इसकी पुष्टि खेरेस्वर के पास रहने वाले पेशवा के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम में भाग लेने वाले सुबेदार सिंह के पोते रामबीर सिंह ने की।

यहां पर विषैले सांपों का लगता है मेला

नागपंचमी के दिन खेरेपति प्रांगण में शोभा नाग-नागिन के लगने वाला मेला बढ़ाता है। सैकड़ों हजारों किलोमीटर से दूर सपेरे इस मेले की शोभा बढ़ाने के लिए छोटे प्रजाति से लेकर बड़े प्रजाति के सांप लाते है। प्राचीन मन्दिर में लगने वाले सांपों के मेले की शोभा बढ़ा देते हैं। ऐसा विगत वर्षाें से नहीं मान्यता के अनुसार पिछले दो वर्षों से लगात चला आ रहा है। इस मेले की खास बात यह होती है कि सांप के विषदंत नहीं तोड़े जाते है। ऐसा इसलिए होता है कि मान्यता के अनुसार इस मन्दिर के निर्माण के बाद आज तक मन्दिर के आसपास किसी भी व्यक्ति की अक्समात सांप के काटने से नहीं हुई है। इसलिए खेरेपति मन्दिर को आसपास वाले क्षेत्र को विषमुक्त कहा जाता है। यहीं चीज इस मेले में देखने को मिलती है। सैकड़ों की तदात में खेरेपति
मन्दिर के प्रांगण में लगे मेले में अनेक विषैले सांप होते है और दूर-दूर से आने वाले लोग मेले का लुप्त उठाते है पर वहां विशैले सांप उन्हें कोई भी हानि नहीं पहुंचाते है।

शुक्रराचार्य ने करवाया था मंदिर का निर्माण

जब कानपुर के इतिहास के पन्नों में जाकर इसकी जानकारी की इकठ्ठी करनी चाही तो एक अनोखी जानकारी इतिहास के पन्नों से निकलकर आई। इतिहास के पन्नों में दर्ज इस प्राचीन मन्दिर की जानकारी इस मन्दिर को और भी महान बना देती है और कानपुर में प्राचीन मन्दिरों से में एक अलग ही पहचान ऊभर कर आती है। जानकारों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि 200 वर्ष पूर्व दैत्य गुरु शुकराचार्य ने अपनी बेटी दैव्यानी का विवाह जाजमऊ के राजा आदित्य के साथ किया था। वहां अपनी

बेटी से मिलने के लिए महल से दैत्य गुरु

शुकराचार्य निकले। खेरपति मन्दिर के कुछ ही दूरी विश्राम के लिए ठहर गए। तभी उनकी आंख लग गई और उन्हें स्वप्न में शेषनाग ने दर्शन देते हुए आदेशित किया कि यहां शिवमन्दिर का निर्माण कराये और
इस मन्दिर में स्वयं वे वास करेंगे। महादेव की शिवलिंग की स्थपना कराये। स्वपन टूटने के बाद दैत्य गुरु शुकराचार्य ने शैषनाग के आदेशों का पालन करते हुए
इस मन्दिर का निमार्ण कराया और विधिविधान के साथ शिवलिंग की स्थापना करायी। जिस प्राचीन मन्दिर में आज भी सावन के माह में भव्य श्रृगांर के साथ उनकी पूजा अर्चना की जाती है।

सांपों को भक्त चढ़ाने के बाद देते हैं छोड़

ऐतिहासिक मन्दिर खेरेपति नें नागपंचमी के दिन हजारों की संख्या में देश व विदेश से भक्त आते हैं। भक्त भगवान शिव को खुश करने के लिए बेलपत्र के साथ ही सपेरों से सांप खरीदते हैं और लिंग पर चढ़ाने के बाद उन्हें जंगल में छोड़ देते हैं। कानपुर नवाबगंज निवासी दिलीप गुप्ता ने बताया कि उनके घर में हररोज विषैले सांप निकलते थे। तभी मोहल्लो के लोगों ने बताया कि श्रावण मास पर खेरेपति धाम जाकर सांप खरीदकर शिव की लिंग पर चढ़ा दें, घर से सांप अपने आप ही चले जाएंगे। दिलीप के मुताबिक वह पत्नी सहित खेरेपति मंदिर गए और सांप खरीदा व भगवान शिव की लिंग पर चढ़ाया। पांच साल बीत गए, लेकिन फिर कभी घर में सांप नहीं दिखे। सावन में खेरेपति मन्दिर के प्रांगण का दृश्य देखने के योग्य होता हैं क्या बूढ़े क्या बच्चे क्या जवान वह महिलाएं आस्था में सरोबर होकर महादेव के दर्शन के लिए व्याकुल दिखती है। देर रात से लम्बी-लम्बी लाइन लगने के बाद भी जब बाबा के दर्शन मात्र ही उन सभी लोगों की थकान दूर हो जाती है। इस प्रांगण का नागपंचमी के दिन महामेले का आयोजन भी किया जाता है।