
कानपुर। कौन कहता है, आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों..’ दुष्यंत के इस शेर से प्रेरणा लेकर राजस्थान भरतपुर जिले के झारोटी निवासी अखिलेश मीणा ने अपनी मां के सपने को पूरा करने के लिए खेतों में पसीना तो घर में चिमनी की रोशनी में पढ़कर आईपीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की। अखिलेश मीणा यूपी के सबसे बड़े शहर कानपुर के एसएसपी के पद पर हैं। वह अपनी इस कामयाबी के पीछे माता-पिता की तपस्या को मानते हैं। एसएसपी अखिलेश मीणा ने बताया कि उनकी मां अक्सर कहा करती थी कि मैं पढ़ लिख नहीं सकी, इसी लिए तू मेहन कर और कलेक्टर बनकर गांव का नाम रोशन कर। मां के इन शब्दों में उनकी आह भी थी और प्रेरणा भी। इन्हीं चंद शब्दों ने बेटे की सुनहरी तकदीर लिख दी और आज वह कलेक्टर तो नहीं बन पाए पर पुलिस के सबसे ओहदे पर बैठे हैं।
असफलता के बाद मिली सफलता
राजस्थान के छोटे से गांव झारोटी (भरतपुर) के मूल निवासी आइपीएस अखिलेश कुमार एक गरीब परिवार से आते हैं इनके पिता किसान थे और खेती कर अपना और अपने परिवार को भरण पोषण करते थे। अखिलेश कुमार की मां पढ़ी लिखी नहीं थीं, इसी के कारण वो अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर देश का सबसे बड़ा अफसर बनाने के सबने बुना करती थी। अखिलेश कुमार बताते हैं कि आठवीं की परीक्षा पास करने के बाद मां ने हमसे कहा था कि बेटा हम तुम्हें कलेक्टर के पद पर देखना चाहते हैं। मां की बात दिल को छू गई और हमने ठान लिया कि अब दुनिया इधर से चाहे उधर हो जाए, पर हमें सिविल सर्विस में जाना ही है। आर्थिक स्थित अच्छी नहीं होने के चलते हमें पिता के साथ खेतों में हल चलाने के साथ ही गाय और भैसों से दूध निकालना पड़ता था। बिजली नहीं होने के चलते रात में चिमनी के सहारे पढ़ाई करनी होती थी। बावजूद हम डटे रहे और पहले प्रयास में असफलता के बाद दूसरे में सफलता मिल गई और हम आईपीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।
प्राथमिक स्कूल से की पढ़ाई
अखिलेश कुमार ने बताया कि कक्षा चार तक की शिक्षा हमने अपने गांव के प्राथमिक स्कूल से की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए भुसावर तहसील में एक स्कूल में दाखिला ले लिया। हाईस्कूल में उम्मीद से कम नंबर आने के बाद मायूस हुए, लेकिन मां ने हौसला बंधाया तो एक बार फिर नए जोश से पढ़ाई में जुट गए। इसके बाद इंटर की पढ़ाई के लिए जयपुर गए। प्रथम श्रेणी में इंटर की परीक्षा पास करने के साथ आईआईटी दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में प्रवेश लिया। 2000 में सिविल इंजीनियोरग पूरी की और सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। उन्होंने बताया कि पहली बार में सफलता न मिलने पर ऐसा लगा कि कोई दूसरी नौकरी कर लूं, लेकिन मां ने फिर हौसला दिया और 2005 में देश की सर्वोच्च परीक्षा पास करने में सफलता मिली और आइपीएस बन गए।
चाचा थे आईआरएस
एसएसपी अखिलेश कुमार के पिता के मौसेरे भाई आईआरएस थे। गांव में उनका रुतबा था। जब भी वो आते तो गांववाले उन्हें आंखों में बैठाते थे। एसएसपी ने बताया कि यह देखकर मन में मां की इच्छा पूरी करने की भावनाओं को बल मिला। इसके लिए पिता ने भी समय-समय पर प्रोत्साहित किया। आईआरएस चाचा ने भी पढ़ाई के दौरान गुर सिखाए और जिसका नतीजा रहा कि हमें अपनी मंजिल मिल गई। एसएसपी ने कहा कि अगर चाहे तो हर मुकाम वह हासिल कर सकता हे। बशर्ते वह पूरी इमानदारी और लगन के साथ निभाएं। आइपीएस अखिलेश बताते हैं कि ग्रामीण परिवेश के चलते स्कूल में छुंट्टी होने पर घर के कामों में भी पिता पूरन लाल का हाथ बंटाते थे। खेत में हल चलाने से लेकर पानी लगाने तक का काम करते थे। वहीं, फसल पकने पर काटने से लेकर घर तक लाने का काम, भैंस के चारे और दूध निकालने तक का काम करते थे। अखिलेश बताते हैं कि आज भी ज बवह अपने गांव जाते हैं तो खेतों में कई-कई घंटे गुजारते हैं। आज भी समय मिलने पर हल पकड़ कर खेत की जुताई थी करते हैं।
बेटा साहब बन गया
एसएसपी अखिलेश मीणा ने बताया कि मां ने उन्हें हमेश प्यार और दुलार के साथ रखा। मां का सिर्फ एक ही सपना था कि वह अच्छी पढ़ाई करे और बड़ा आदमी बनें। एसएसपी ने बताया कि जब उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और सिविल सर्विस की तैयारी शुरू की तो एक मौका ऐसा भी आया कि चलो कलेक्टर की बजाए सरकारी बाबू बन जाएं। जब मां ने हमारी हौफलाजाई की और मिशन से नहीं हटने का हुक्म सुनाया। उन्होंने कहा जब किसानी के दौरान फसल चौपट हो जाती है तो क्या हम खेती करना छोड़ देते हैं। मां की इसी बात से उन्हें बल मिला और दूसरे प्रयास में आईपीएस के सिलेक्ट हो गए। जब हम बावर्दी पहनकर अपने गांव गए तो मां ने गांववालों से कहा कि देखों बेटा साहब बन गया और अपने गांव का रूतबा बढ़ाया।
Published on:
13 May 2018 10:08 am
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