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Labor Day Specials – मजदूरों के खून से स्वदेशी हुई लाल, लेवर मूवमेंट की टूट गई कमर

41 साल पहले मजदूरों और पुलिस के बीच हुई थी झड़प, टूट गई मजदूरों की कमर

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41 साल पहले मजदूरों और पुलिस के बीच हुई थी झड़प, टूट गई मजदूरों की कमर

कानपुर। रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा आवश्यकता जीवन की, व्यक्ति और परिवार सुखी हो तभी मुक्ति होती सच्ची। हंसते- हंसते राष्ट्र कार्य में शक्ति लगाने वाले हम, शोषित, पीडित, दलित जनों का भाग्य बनाने वाले हम। जैसे गीत गाते हुए कानपुर में सैकड़ों की संख्या में मजदूर शहर के दर्जनों मिलों में सुबह से लेकर शाम तक मजदूरी करते। उनके बनाए कपड़े, देश ही नहीं विदेश में बिकते थे। इसी के चलते इसका नाम मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट पड़ा। देश की सबसे बड़ी मजदूर युनियन कानपुर में थी और एक आवाज पर मजदूर हड़ताल पर चले जाते थे। एक वक्त था कि लखनऊ से लेकर दिल्ली की सरकार मजदूर ही बनाते और गिराते थे। पर 41 साल पहले एक घटना ने मजदूर के हाथों से रोजगार छीन लिया तो मिलों में ताले जड़वा दिए। ं 6 दिसबंर 1977 को जुही स्थित स्वदेशी मिल में वेतन को लेकर मजदूर और अफसरों के बीच खूनी संग्राम हुआ था। मिल के मैनेजर को व्यालर में जिंदा दफन करने के बाद पुलिस और मजदूरों के बीच जंग हुई थी। पांच घटे तक चली मुठभेड़ के दौरान 13 मजदूरों की जान गई थी, तो कई दर्जन पुलिसबल के जवान घायल हुए थे। इसी के बाद मजदूरों की पकड़ सत्ता और प्रशासन से दूर होती गई। आज हालात ऐसे हैं कि मजदूर फैक्ट्रियों में 12 से 14 घंटे ड्यूटी करता है वेतन के नाम पर पांच से छह हजार रूपए मिलते हैं।
मैनेजर को जिंदा बॉयलर में झोंक दिया
कानपुर लेवर मूवमेंट का गढ़ हुआ करता था। यहां पर देश की सबसे बड़ी मजदूर युनियन थी, जिसके एक आवहन पर मजदूर मरने और मारने पर उतारू हो जाया करते थे। चुनाव के वक्त जिस दल की तरफ कानपुर के मजदूर खड़े हो गए, दिल्ली की कुर्सी उसे मिल जाया रकती थी। मजदूरों की यूनियन से राजनीतिक दलों के साथ मिल मालिक बहुत परेशान रहते थे। अक्टबूर 1977 को जुही स्थित स्वदेरूी मिल के मालिक ने घाटा दिखाकर मजदूरों का वेतन के साथ ही उनकी छटनी शुरू कर दी। जिसके कारण मजदूर उग्र हो गए और हड़ताल पर चले गए। दो माह तक मजदूर यूनियन और मिल मालिक के बीच वर्तालाप हुई, लेकिन नतीजा नहीं निकला। मिल के मजदूर बतरिया निवासी जब्बार बताते हैं कि 6 दिसंबर, 1977 का दिन था और मिल के अंदर मैनेजमेंट और मजदूर नेताओं के बीच बात चल रही थी। इसी दौरान मिल के बाहर खड़े मजदूरों को पीट दिया गया। इसकी भनक जैसे ही अंदर गई तो यूनियन के नेताओं ने आपा खो बैठे और मिल के अंदर, दो अधिकारी, अकाउंटेंट आरपी शर्मा को अगवा कर प्रोडक्शन मैनेजर बीएनके आर्य को बॉयलर में झोंक दिया गया। जिसके चलते बीएनके आर्या की मौके पर मौत हो गई।
13 मजदूरों को पुलिस ने उतारा मौत के घाट
मैनेजर के बॉयलर में झोंकें जाने की बाद मजदूरों अकाउंटेंट आरपी शर्मा को बंधक बना लिया। यह खबर जैसे मिल मालिक को हुई तो उसने पुलिस-प्रशासन को सूचना दी। कई थानों की फोर्स के साथ डीएम और एसपी स्वदेशी मिल पहुंचे। डीएम ने मजदूरों के नेताओं से अकाउंटेंट आरपी शर्मा को छोड़ने के साथ अपने आपको सरेंडर करने का कहा, लेकिन मजदूरों ने पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मजदूरों पर सीधे ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। पुलिस की गोलीबारी से 13 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई और 200 से ज्यादा घायल हो गए। पूर्व मजदूर नेता शिव बिहारी प्रजापति ने मुताबिक इस घटना के बाद पूरे देश के मजदूर हड़ताल पर चले गए और कानपुर में सभी मिलों पर ताले पड़ गए। पुलिस की गोली का शिकार उनके चाचा भी हो गए। इस कांड के बाद कानपुर में मिलों के बंद होने का सिलसिला शुरू हो गया था और मजदूरों का किला ढह गया।
इस कांड के बाद छिन्न-भिन्न हो गई यूनियन
पूर्व मजदूर राजाराम सिंह ने मुताबिक कानपुर श्रमिक आंदोलनों का बड़ा केंद्र हुआ करता था। पर स्वदेशी मिल का आंदोलन कानपुर का आखिरी उग्र श्रमिक आंदोलन था। 1977 की घटना को लोग इसलिए भूल चुके हैं क्योंकि कानपुर की बड़ी मिलों के बंद होने के साथ ही शहर के मज़दूरों की जो ताक़त थी, वो ख़त्म हो चुकी है। कानपुर का जो लेबर मूवमेंट था वह छिन्न -भिन्न हो चुका था और सिर्फ कानपुर ही क्यों पूरे देश में लेबर मूवमेंट खत्म हो रहा था। एक समय था जब दत्ता सामंत जैसे लोग मुंबई को हिला देते थे, वह पीढ़ी ख़त्म हो रही थी या ख़त्म हो चुकी थी। 1970 से एक बड़े ट्रेड यूनियन नेता रहे दौलत राम का कहना है कि अगर स्वदेशी मिल अब भी चल रही होती तो कानपुर के मिल मजदूर और आम लोग 6 दिसंबर 1977 की खूनी घटना को जरूर याद रखते।
24 घंटे चलती थी मिल
मजूदर नेता अनूप तिवारी बताया कि उस वक्त स्वदेश मिल में लगभग 22 हजार मजदूर काम करते थे। मिल में 24 घंटे काम होता था पर मिल की वित्तीय हालत ठीक नहीं थी। वेतन समय पर नहीं मिल रहा था। बताया कि एक समय ऐसा आया कि मजूदरों का नौ महीने का वेतन बकाया हो गया। मालिकान ने आकउंटेट प्रोडक्शन मैनेजर बीएनके आर्य को मजदूर नेताओं से बातचीत कर हल निकालने के लिए नियुक्त किया। लेकिन उन्होंने मिल घाटे में चल रही है कि बात कहकर महज दो माह का वेतन देने की बात कही। जिस पर मजदूर नेता उनसे भिड़ गए। प्रोडक्शन मैनेजर बीएनके आर्य पुलिस के जरिए उन्हें खदेड़ना चाहा। इससे गुस्साए मजदूरों ने उन्हें जिंदा बॉयलर में जलाकर मौत के घाट उतार दिया। पुलिस और मजदूरों के बीच संघर्ष हुआ और हार मजदूरों को उठानी पड़ी।