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Birbal Story: बीरबल के किले की छत में बने सरोवर को किसी अकबर की दरकार

पत्नी के कहने पर बीबीपुर में किले का करवाया था निर्माण, उसी के अंदर सरोवर और कुआ भी मौजूद, सरकारी उपेक्षा के चलते धरोहररें खंडहर में तब्दील।

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कानपुर। दादा-दादी अपने पौत्रों को अकबर-बीरबल के किस्से-कहानियां आज भी सुना कर उन्हें हंसाते हैं। पर प्रदेश सरकार की उपेक्षा के चलते बीरबल का किला, सरोवर, कुआ , मदिर समेत अनेक धरोहरें खंडहर में तब्दील हो गई हैं। जिनके जीर्णोद्धार के लिए आज भी किसी अकबर की दरकार है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे इलाके को पर्यटन क्षेत्र बनाने का ऐलान किया था, लेकिन जमीन पर एक पैसे का कार्य नहीं हुआ।

दर्द से कराह रहीं धरोहरें
सजेती थाना क्षेत्र के बीबीपुर गांव से बीरबल का खास लगाव था। वो अपनी पत्नी के साथ यहां आते थे। पत्नी के कहनें पर उन्होंने यहां एक बड़े किले के अलावा सरोवर, कुए और भगवान शिव के मंदिर का निर्माण करवाया था। पत्नी अपने सहेलियों के साथ सरोवर में स्नान के बाद भगवान शिव की पूजा किया करती थीं। साथ ही कुएं के पानी को दरवारी महल तक पहुंचाते थे। लेकिन सरकारों की उपेक्षा के चलते बीरबल की ये धरोहरें दर्द से करार रही हैं। महल पूरी तरह से क्षतिग्रस्त, सरोवर की 24 एकड़ जमीन पर माफियाओं ने कब्जा कर लिया है तो वहीं कुआ कूड़े कचरे से पटा है।

दहीलर गांव में बीरबल का हुआ था जम्म
राजा बीरबल का जन्म संवत 1584 विक्रमी में दहिलर गांव में हुआ था। उन्होने अपना जीवन वहां तब तक बिताया जब तक अकबर सम्राट उन्हें अपने साथ ले नहीं गए। कुछ साल के बाद वो अपनी पत्नी के साथ जन्मभूमि आए। इसी दौरान वह पत्नी के साथ अपने बीबीपुर गए। पत्नी को गांव भा गया और उन्होंने यहीं पर महल के निर्माण की मांग कर दी। बीरबल ने पत्नी के लिए महल, सरोवर, कुआ और भगवान शिव का मंदिर बनवाया। महल के अंदर प्रवेश करते ही एक कोठरी है। कोठरी के बाद एक बड़ा आंगन और आंगन के तीनों ओर कमरे हैं। गांव के प्रधान रघबुर बताते हैं, रख-रखाव नहीं होने के चलते महल पूरी तरह से वीरान हो गया है। अब ग्रामीण भी यहां आने खौफ खाते हैं।

ऐसे अकबर से हुई मुलाकात
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं, बीरबल की मां कालपी की रहने वाली थीं। वो वहां से आकर अपने मायके दहिलर गांव में बस गई। बीरबल ने अपने बालपन से ही अपनी वाकपटुता और कुशाग्र बुद्धि के कारण लोकप्रिय थे। बीरबल फारसी और संस्कृत के विद्वान थे और कविताएं भी लिखा करते थे। इसके अलावा उनकी शिक्षा संगीत में भी हुई थी। यही वजह है कि सबसे पहले उन्हें जयपुर के महाराज के दरबार में और बाद में रींवा के महाराज के दरबार में बतौर राज कवि रखा गया था। उसी दौरान अकबर दहीलर गांव आए और उनकी मुलाकात बीरबल से हो गई। अकबर बीरबल की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें अपने साथ में गये। फिर बीरबल कभी दहीलर नहीं आये।

लाट का कोई अंत नहीं
बीरबल ने बिहारेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया था, जो आज भी मौजूद है। इस मन्दिर में लगी लाट बीरबल की तरह लोगों के लिए आज भी पहेली है। मन्दिर में एक लाट है। जिसका कोई अंत नहीं है। लाट को लेकर कौतुहल उसकी माप को लेकर है। इसे जितनी बार नापा जाता है उतनी बार इसकी नाप छोटी बड़ी होती रहती है। लाट में तमाम कलाकृतियां भी बनी हुई हैं। जिन्हें देखकर खजुराहो की कलाकृतियों की याद आती है। ककई ईंटों से बना यह मन्दिर सोहलवीं शताब्दी का निर्मित होना बताया जाता है। गांव के प्रधान बताते हैं कि आजादी के बाद कई सरकारें आई और गई। सबने बीरबल के इलाके को पर्यटनक्षेत्र बनाने की घोषणा की, लेकिन वह आज तक जमीन पर नहीं उतरी।