
पंजाब से इंदर सिंह आए, कानपुर में सिख छा गए
कानपुर। हर शहर को संवारने और बनाने में समाज का अहम योगदान रहता है। कानपुर का नाम कई समाज, समुदाय व धर्म के लोगों ने किया, जिसके चलते इसका नाम मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट पड़ा। पर 1923 में बाहर से आए इंजीनियरिंग वर्क्स के सरदार इंदर सिंह ने मशीनरी, लोहा, ट्रासंपोर्ट का कारोबार शुरू किया। इस काम को अन्य सिख समाज के लोगों ने अपना रोजगार बना लिया। इसी के चलते शहर को व्यापारिक पहचान देने का श्रेय मुख्य रूप से सिख समाज को जाता है। श्रीगुरु सिंह सभा लाटूश रोड के प्रधान हरविंदर सिंह लार्ड ने बताते हैं कि इंदर सिंह ने अकेले लोहे के समानों को बनाते और घर-घर बिक्री करते। उनके चलते शहर में लंगर का आयोजन पहली बार सिखों ने ही शुरू किया था, जो आज भी जारी है।
कौन थे सरकार इंदर सिंह
सरदार इंदर सिंह पंजाब से 1923 में कानपुर आए और जरीब चौकी के पास किराए के मकान में अपना ठिकाना बनाया। उन्होंने घर के पास ही सबसे पहले सिंह इंजीनियरिंग वर्क्स नाम से इकाई लगाई। वो खुद लोहे का समान तैयार करते और फिर हाथ ठेला के जरिए गली, मोहल्लों और लोगों को घरों में बेचने के लिए निकल पड़ते। कुछ माह के अंदर उन्होंने कारोबार में अच्छा मुनाफा कमाया तो पंजाब से तेजा सिंह, हर विलास राय और सरदार करतार सिंह सोनी को बुला लिया और अपने साथ काम पर रखा। चारों ने मिलकर कारोबार को तेज गति से बढ़ाया और पांच साल के बाद सरदार इंदर सिंह के लोहे के समान की डिमांड कानपुर के अलावा आसपास के जिलों में होने लगी। मांग ज्यादा होने पर इंदर सिंह ने करीब पांच सौ लोगों को और बुला लिया और सबको काम दे दिया। इसी के साथ से लोहे का बेताब बादशाह सिख समाज हो गया।
मेहनत के बल पर हासिल किया मुकाम
इंदर सिंह व उनके अन्य साथियों ने महज तीन सालों में अपनी मेहनत और काबलियत के दम पर कानपुर में अच्छा मुकाम बना लिया। तेजा सिंह और हर विलास राय ने 1927 में श्रीगुरु सिंह सभा की स्थापना की और पहले संस्थापक के रूप में सरदार इंदर सिंह को नियुक्त किया। कुछ ही साल बाद संत सुंदर सिंह और संत बाबा मोहन सिंह आए थे। इन लोगों ने 1937 में गुरु नानक इंटर कॉलेज की नींव रखी ताकि शहर के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। साथ ही, लाटूश रोड गुरुद्वारे की स्थापना की। ताकि सिख समाज का भी अपना गुरुद्वारा हो और जहां वे अरदास कर सकेंगे। पहला लंगर प्रकाश पर्व पर शुरू हुआ और इसके बाद यह सिलसिला आज भी तेज गति से चल रहा है।
पाकिस्तान से आकर कानपुर में बसे
आजादी मिलने के बाद पाकिस्तान नाम के देश का उदय हो गया। पाकिस्तान में हिन्दू, सिख और जैन समाज पर वहां के लोगों ने मारकाट शुरू कर दी। इसी के कारण 1947 में बड़ी संख्या में सिख कानपुर शहर आए और बस गए। धीरे-धीरे समाज के लोग बढ़ते गए और व्यवसाय को भी बढ़ाते गए। समाज के लोगों ने मशीनरी, ट्रांसपोर्ट, लोहा और कपड़ा की इकाई स्थापित कीं। श्रीगुरु सिंह सभा लाटूश रोड के प्रधान हरविंदर सिंह लार्ड ने बताया कि पाकिस्तान से कानपुर आए सिख समाज के लोगों को कानपुर के लोगों ने खुद की जमीन निशुल्क में देकर उन्हें रहने की व्यवस्था की थी। कहते हैं, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ लोगों ने यहां आग लगाई, जिसके चलते कई जाने गई। पर सिख और अन्य समाज के लोग पुराने जख्मों को भुला कर फिर एक साथ गले से गले मिलकर चल पड़े।
दो लाख से ज्यादा सिख समाज के लोग
प्रधान हरविंदर सिंह लार्ड कहते हैं, आज शहर में समाज का बड़ा दायरा है। करीब दो लाख सिख समाज के लोग हैं। शहर में 50 गुरुद्वारों और जत्थे-बंदियों के अलावा अनेक धर्मशाला हैं। समाज के लोग बढ़चढ़ कर शहरवासियों के दुख-सुख में शामिल होते हैं। आज शहर में सिख अपनी आन, बान और शान के अलावा प्रेम के लिए भी जाना जाता है। कई ऐसे मौके आए जब सिख समाज के लोगों ने बढ़चढ़ कर अपनी जिम्मेदारी संभाली। कहा, ‘आज हमें फर्क है कि हम कानपुर में रहते हैं और यह शहर हमारा है। इसे बेहतर बनाने के लिए सिख हर समय तैयार रहता है। शहर में कईबार संप्रदायिक महौल खराब हुआ, लेकिन दिल में ज्यादा दिनों तक खटास नहीं रही।
राजनीति और शिक्षा में अहम रोल
कानपुर के सिख समाज ने सियासत में थी अपने काम का लोहा मनवाया। सरदार इंदर सिंह राज्यसभा सदस्य रहे तो सरदार महेंद्र सिंह, महापौर और सरदार कुलदीप सिंह, एमएलसी चुने गए। कानपुर से देश प्रदेश को कई सिख समाज के नेता दिए। हरविंदर सिंह लार्ड बताते हैं कि सिख समुदाय शिक्षा स्वास्थ्स में भी अपना अहम योगदान दिया। जिसमें प्रमुख रूप से गुरु नानक इंटर कॉलेज, कौशलपुरी, गुरु नानक डिग्री कॉलेज, कौशलपुरी, गुरु नानक बालक इंटर कॉलेज, नारायणपुरवा, गुरु नानक इंटर कॉलेज, लाटूश रोड, गुरुद्वारा लाटूश रोड, लाटूश रोड, गुरुद्वारा कीर्तनगढ़, गुमटी नंबर 5, गुरुनानक धर्मशाला, कौशलपुरी, जस्सा सिंह हॉल, आर्यनगर प्रमुख रूप से हैं।
Published on:
09 Aug 2018 06:21 pm
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