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ब्राह्मण अति जातिवादी…ब्रिटिश काल के 1919 के आदेश का हवाला देकर स्वामी प्रसाद मौर्य ने छेड़ा नया विवाद

Swami Prasad Maurya questioned the court decision. स्वामी प्रसाद मौर्य ने अंग्रेजों की व्यवस्था का समर्थन करते हुए उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय पर सवाल उठाया है। पूछा- "क्या उनके निर्णय जातिवाद से प्रभावित नहीं होते हैं?"

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स्वामी प्रसाद मौर्य फोटो सोर्स- X स्वामी प्रसाद मौर्य

फोटो सोर्स- X स्वामी प्रसाद मौर्य

Swami Prasad Maurya questioned the court decision. स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक लगा दी थी। वही ब्राह्मण आज न्यायिक सेवाओं में 70 से 80% तक भरे पड़े हैं। उन्होंने पूछा कि क्या ब्राह्मण का चरित्र बदल गया? स्वामी प्रसाद मौर्य के एक्स पर किए गए इस पोस्ट के बाद कई आपत्तिजनक टिप्पणियां आई हैं। लोग एक दूसरे पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर भी बातें हो रही हैं। मानसिक संतुलन बिगड़ने तक की बातें लिखी गई हैं। ‌

क्या लिखा स्वामी प्रसाद मौर्य ने?

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य चार बार विधायक बने। उन्होंने कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया है। वे बीजेपी में भी रह चुके हैं। जो इस समय अपनी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। अपनी ताजा टिप्पणी में उन्होंने लिखा है कि अंग्रेज शासकों ने ब्राह्मणों को अति जातिवादी बताया था। उन्होंने कहा था कि ब्राह्मण जाति के आधार पर फैसला लेता है, उनका चरित्र न्यायिक नहीं होता है।

अंग्रेजों ने न्यायिक सेवा में आने से लगाई थी रोक

स्वामी प्रसाद मौर्य ने आगे लिखा कि इसलिए ब्रिटिश शासन ने 1919 में ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक लगा दी थी। इसका शासनादेश भी जारी किया था। स्वामी प्रसाद मौर्य ने लिखा है कि सोचिए जिन ब्राह्मणों पर न्यायिक सेवा में जाने पर रोक लगाई गई थी, वही ब्राह्मण आज सभी प्रकार की न्यायिक सेवाओं में हैं। यहां तक कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी 70 से 80% तक भरे हैं।

पूछा, "क्या ब्राह्मण का न्यायिक चरित्र बदल गया?"

स्वामी प्रसाद मौर्य ने आगे लिखा कि क्या अब ब्राह्मण का न्यायिक चित्र बदल गया है? यदि नहीं तो क्या अब उनके फैसले जातिवाद से प्रभावित नहीं होते हैं? क्या उनके द्वारा लिए गए फैसले निष्पक्ष होते हैं? उन्होंने लिखा कि न्यायपालिका पर उन्हें विश्वास और आस्था भी है। परंतु यूजीसी कानून-2026 मामले पर रोक ब्रिटिश हुकूमत से 1999 के शासनादेश पर विचार करने को मजबूर करता है।