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अजीमुल्ला ने प्लांट किया था 56 पौंड का बम, थर्रा उठा था कानपुर का रेलवे स्टेशन

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।

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Akansha Singh

Aug 09, 2017

kanpur central

कानपुर। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। हितैषी जी द्वारा लिखा यह गीत उन दिनों हर क्रांतिकारी के मन में नया जोश भर देता था। उन्हें लगता था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन देश स्वतंत्र होगा और हुआ भी। वहीं अंग्रेजों के चंगुल से भारत आजाद हो गया। आजादी का बिगुल बिठूर से 1857 में बजा और अगस्त 1942 तक बदस्तूर जारी रहा। आज के ही दिन क्रांति के जुनून में कानपुर के सुरमाओं ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दी थी। पूरे शहर में सरकारी इमारतों और रेलवे स्टेशनों पर बम प्लान्ट करने की रणनीति बनी। जिसके तहत क्रांतिकारी अजीमुल्ला को सेंट्रल स्टेशन में बम लगाने का टारगेट दिया गया। वो 56 पौंड के टाइम बम को लेकर प्लेटफार्म एक पर पहुंचा और सीढ़ियों में लगा दी। कुछ ही मिनटों में स्टेशन के परखच्चे उड़ गए। स्टेशन की छत करीब 40 फुट तक उड़ गई।


75 साल पहले कानपुर से उठी थी आवाज


नौ अगस्त 1942 को स्वतंत्रता सेनानियों ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया था। कानपुर अगस्त क्रांति का प्रमुख गढ़ रहा। यहां से स्वतंत्रता सेनानियों ने गुप्त तरीके से आंदोलन को धार दी थी। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए 4 जुलाई 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि यदि अंग्रेज भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ व्यापक स्तर पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाए। इस प्रस्ताव को लेकर हालांकि पार्टी के भीतर मतभेद पैदा हो गए और प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। पंडित जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद प्रस्तावित आंदोलन को लेकर शुरूआत में संशय में थे। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर इसके समर्थन का फैसला किया। इसी बीच क्रांतिकारियों ने भी कमर कस ली और अंग्रेजों के खिलाफ हमला करने के लिए मैदान पर कूद पड़े। इस दौरान क्रांतिकारियों ने नयागंज डाकघर को बम से उड़ा दिया।


डाकघर को उड़ाकर की शुरूआत


अगस्त क्रांति के एलान होते ही शहर से डॉक्टर जवाहरलाल रोहतगी, छैल बिहारी कंटक, प्यारेलाल अग्रवाल समेत कई बड़े नेता कानपुर से मुम्बई को कूंच कर गए। इनके जाने के बाद अंग्रेजों को भगाने के लिए युवा क्रांतिकारी सरकारी इमारतों और प्रतिष्ठान को बम से उड़ाने की प्लानिंग करने लगे। इतिहासकार एसपी सिंह बताते हैं कि बालकृष्ण नवीन के नेतृत्व में आधा दर्जन क्रांतिकारियों ने नयागंज में बैठक की और डाकघर को बम से उड़ाने के लिए कमर कस ली। बालकृष्ण खुद बम लेकर निकले और डाकघर के बाहर उसे प्लान्ट कर दिया। कुछ ही मिनटों में जोरदार धमाके के साथ पूरी इमारत ध्वस्थ हो गई। डाकघर में बम प्लान्ट करने के आरोप में बालकृष्ण गिरफ्तार कर लिए गए।


कुली के भेष में पहुंचे स्टेशन


प्रोफेसर एसपी सिंह बताते हैं कि अजीमुल्ला समेत पांच लोगों ने घड़ी बैटरी से 56-56 पौंड के दो बम बनाए थे। स्टेशन को उड़ाने की जिम्मेदारी पहले जगदीश दुबे, बजरंग सिंह, बाबूराम अ स्थाना को दी गई थी, लेकिन अजीमुल्ला अकेल स्टेशन पर बम लगाने को अड़ गए। जिसके चलते उन्हें बम दे दिया गया। वो कुली के भेष में रेलवे स्टेशन के अ ंदर दाखिल हुए। तभी उनका पता चला कि कालका मेल एक नंबर प्लेटफार्म पर आने वाली है, तो वो दो की जगह एक नंबर पर पहुंच गए। उन्होंने प्लेटफार्म की सीड़ियों के नीचे बन लगा दिया। जेसे ही कालका मेल रूकी तो तेज धमाके के साथ बम फट गया। बन की क्षमत इतनी जबरदस्त थी के छत 40 फुट उड़ गई। कालका मेल के कई डिब्बे में इसकी चपेट में आ गए और यात्रियों को घायल हुए थे। प्रोफेसर सिंह बताते हैं कि बम विस्फोट के कई घंघ्े अजीमुल्ला स्टेशन पर रहे थे।


ऐसे तैयार किए थे बम


क्रांतिकारियों ने 56-56 पौंड के दो बम बनाए थे। क्रांतिकारियों ने चंद्रिकादेवी चौराहा निवासी एक प्रेस के मालिक को शामिल किया। चंद्रिकादेवी गांधी उद्यान के पास रहले वाले ब्रम्हदत्त के घर में रहने वाले घनश्याम चावला के यहां बम बनाए गए। 200 रूपए प्रति पौंड का पिकरिक एसिड चाहिए था। आनंद प्रकाश सनेजा ने कॉलेज की प्रयोगशाला का रसायन लाकर मदद की। चूल्हे पर एसिड तैयार करते समय उसका धुअां मोहल्ले पर फैल गया। जिसके कारण क्रांतिकारियों ने आनन-फानन में वो घर छोड़कर सीधे बिठूर निकल गए। कुछ ही देर बाद पुलिस ने मकान मालिक को अरेस्ट कर लिया। लेकिन उन्होंने बम के बारे में पुलिस को कुछ नहीं बताया।