
32 माह से अटका है कैलादेवी अभयारण्य ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण
32 माह से अटका है कैलादेवी अभयारण्य ईको सेंसेटिव जोन का निर्धारण
राज्य सरकार ने आक्षेपों की पूर्ति में लगा दिए दो साल
अब प्रस्ताव फिर भेजा केन्द्र सरकार को
20 करोड़ सालाना के राजस्व का हो रहा नुकसान
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
करौली. कैलादेवी अभयारण्य क्षेत्र में इको सेंसेटिव जोन निर्धारण का मामला 32 माह से अटका है। इस कारण 50 खनिज पट्टों के नवीकरण नहीं हुए हैं और आगे 75 खनिज पट्टों का नवीनीकरण भी मुश्किल है। इससे सरकार को सालाना 20 करोड़ रुपए के विभिन्न राजस्व की चपत लग रही है। इतना ही नहीं आमजन हित के विकास कार्यो पर भी रोक लगी है।
इलाके के खनिज व्यवसाय को राहत और थमे विकास को गति देने के इस मामले में दोनों सरकार शिथिल रही है। दो वर्ष से मामले की पत्रावली आक्षेपों के कारण राज्य सरकार स्तर पर लम्बित थी, जिसे 10 दिन पहले फिर केन्द्र सरकार को भेजा गया है। इको सेंसेटिव जोन निर्धारण के प्रस्ताव पर अंतिम सहमति केन्द्र सरकार की होनी है।
यूं तो वन एरिया में वर्ष 2006 से गैरवानिकी गतिविधियों पर रोक है। लेकिन तीन वर्ष पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के आदेश की पालना में कैलादेवी अभयारण्य क्षेत्र की सीमा से 10 किलोमीटर परिक्षेत्र में गैरवानिकी गतिविधियों पर प्रतिबंध में सख्ती दिखाई।
प्रदूषण एनओसी को किया बंद
खनिज विभाग ने अभयारण्य क्षेत्र की 10 किमी. की परिधि में करौली, सपोटरा, कैलादेवी, मण्डरायल इलाके में सैण्ड स्टोन, सिलीका सैण्ड, बजरी खनन आदि के 124 खनिज पट्टे जारी कर रखे हैं।
खनिज पट्टाधारी को 3 से 5 वर्ष में खनिज व्यवसाय के लिए प्रदूषण बोर्ड से सम्मति (एनओसी) लेना अनिवार्य होता है लेकिन प्रदूषण बोर्ड ने पिछले तीन साल से एनजीटी के आदेश पर सख्ती से अमल करने के लिए अभयारण्य सीमा से 10 किलोमीटर परिधि में आ रही खदानों की एनओसी देना बंद कर रखा है। इससे 50 खनिज पट्टों की पत्रावली तो एनओसी के इंतजार में अटकी है। जबकि आगे भी जिन खनिज पट्टों को प्रदूषण के अनापत्ति प्रमाण पत्र की जरूरत होगी उनको भी एनओसी नहीं मिल सकेगी।
दो साल लगे दो बिन्दुओं के आक्षेप में
राज्य सरकार ने नवम्बर 2018 में केन्द्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय को अभयारण्य सीमा से एक किमी. दायरे में गैर वानिकी गतिविधि पर रोक लगाना प्रस्तावित किया। प्रस्ताव पर 10 माह बाद दो बिन्दुओं का आक्षेप लगाकर इसे राज्य सरकार को लौटा दिया।
इन आक्षेपों की पूर्ति करने में राज्य के वन विभाग की शिथिलता यह रही कि लगभग 2 साल का समय आक्षेपों को पूरा करने में लग गया। ये भी तब सम्भव हुआ जब खनिज व्यवसायियों ने लगभग एक दर्जन बार वन मंत्री, चार बार मुख्य सचिव तथा आधा दर्जन से अधिक बार वन अफसरों से मुलाकात कर पत्रावली जल्दी भेजने का आग्रह किया। सांसद मनोज राजौरिया ने राज्य सरकार की शिथिलता का मामला संसद में उठाया।
ये होगा लाभ
ईको सेंसेटिव जोन निर्धारण से केवल खनिज कारोबारियों के साथ अभयारण्य क्षेत्र सीमा के निवासियों को भी लाभ मिलेगा। इससे केवल एक किमी. की परिधि में गैरवानिकी गतिविधियों पर रोक प्रभावी रहेगी। इससे खनिज व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा और विकास के रास्ते भी खुलेंगे। अभी अभयारण्य सीमा के प्रतिबंधों के कारण बिजली, सड़क सहित अन्य कार्यो पर रोक है।
राजनीतिक पैरवी रही कमजोर
खनिज व्यवसायियों का कहना है कि कैलादेवी अभयारण्य के साथ राजसमंद संसदीय क्षेत्र से कुम्भलगढ़ अभयारण्य, कोटा संसदीय क्षेत्र से मुकंदरा अभयारण्य के भी ईको सेंसेटिव जोन के प्रस्ताव केन्द्र को भेजे गए थे। वहां की मजबूत राजनीतिक पैरवी से इन प्रस्तावों पर काफी पहले केन्द्र की मुहर लग चुकी है। जबकि कैलादेवी अभयारण्य का प्रस्ताव अभी तक अटका है।
राज्य सरकार ने की देरी
कैलादेवी अभयारण्य के सेंसेटिव जोन निर्धारण के मामले में राज्य सरकार की उदासीनता रही है। राज्य सरकार की देरी पर मामले को लोकसभा में भी उठाया था। दो साल तक राज्य सरकार ने आक्षेप पूरा करके नहीं भेजे। अब पत्रावली केन्द्र को भेजीहै। जल्दी वन पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र जी यादव से मुलाकात करके निस्तारण कराने का प्रयास करेंगे।
मनोज राजौरिया, सांसद, करौली-धौलपुर संसदीय क्षेत्र
Published on:
19 Jul 2021 08:47 pm
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