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प्रदेश के प्रमुख 10 पशु मेलों में शुमार करौली के शिवरात्रि पशु मेले का अब ऐसा हो रहा हश्र

करौली. रियासतकाल से लेकर दशकों तक प्रदेश में अपनी पहचान बनाए रखने वाला करौली का प्रसिद्ध शिवरात्रि पशु मेला अब अपनी पहचान खोता जा रहा है।

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प्रदेश के प्रमुख 10 पशु मेलों में शुमार करौली के शिवरात्रि पशु मेले का अब ऐसा हो रहा हश्र

प्रदेश के प्रमुख 10 पशु मेलों में शुमार करौली के शिवरात्रि पशु मेले का अब ऐसा हो रहा हश्र

करौली. रियासतकाल से लेकर दशकों तक प्रदेश में अपनी पहचान बनाए रखने वाला करौली का प्रसिद्ध शिवरात्रि पशु मेला अब अपनी पहचान खोता जा रहा है। स्थिति यह है कि प्रदेश के प्रमुख दस पशु मेलों में शुमार इस पशु मेले के अस्तित्व पर पूरी तरह संकट के बादल मंडरा रहे हैं। साल दर साल कम हो रही पशुओं की संख्या के चलते मेला सिमट सा गया है।

कुछ वर्षों पहले तक मेला शुरू होने से पहले ही मेला मैदान पर हजारों पशुओं का जमावड़ा हो जाता था, लेकिन इस वर्ष शनिवार शाम तक मेले में महज 266 पशु ही आए हैं। कुल मिलाकर पशुपालकों का मेले के प्रति मोहभंग होता जा रहा है।

पशुपालन विभाग के अधिकारी गोवंश की संख्या में कमी आने को लेकर नियमों की जटिलता बताते हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि पशुपालकों को पर्याप्त सुविधाओं के अभाव के चलते उनका मेले के प्रति रूझान कम हुआ है।

पशुपालन विभाग की ओर से वर्ष 1964 से आयोजित किए जा रहे इस मेले में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मेले में आने वाले पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। विशेष रूप से गोवंश, अश्ववंश की संख्या में कमी आइ है। पिछले चार-पांच वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो सभी प्रकार के पशुओं की संख्या 4 से 6 हजार होती थी, जबकि उससे पहले तक राजस्थान सहित मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश के विभिन्न स्थानों से 10 हजार तक पशु यहां आते थे।


वर्ष दर वर्ष पशुओं का आंकड़ा
शिवरात्रि मेले में पहले प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रदेश के विभिन्न जिलों से विभिन्न वंश के पशु आते रहे हैं। इनकी प्रदेश के ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश से आने वाले पशुपालक खरीदारी करते हैं। वर्ष 2016 में शिवरात्रि पशु मेले में 6126 पशुओं की आवक हुई थी, वहीं 2017 में यह संख्या घटकर 4689 रह गई। इसके बाद 2018 में इस संख्या में और कमी आई और मेले में 4585 पशु आए। गत वर्ष 2019 में तो स्थिति और भी अधिक खराब हुई और पशुओं की संख्या महज 1288 ही रह गई।


इस बार और भी बुरे हालात
मेले के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे का नमूने इस बार कुछ विशेष ही नजर आया है। मेला शुरू होने के एक दिन पहले तक मेले में महज 14 गोवंश की आवक हुई, वहीं उष्ट्रवंश भी महज 147 की संख्या में आया है।

अन्य पशुओं सहित कुल 266 पशु मेले में आए। जबकि 6-7 वर्ष पहले की स्थिति देखें तो मेले के उद्घाटन की निर्धारित तिथि से पांच-सात दिन पहले से ही मेला मैदान पर पशुपालक पशुओं को लेकर आ जाते थे और पशुओं की खरीद-फरोख्त शुरू हो जाती। इतना ही नहीं अनेक पशुपालक तो रवानगी के लिए पैनल्टी रवन्ना चुकाकर भी पशु लेकर लौट जाते। लेकिन इस बार मेला मैदान पर यह स्थिति भी नहीं है। मैदान पर उष्ट्रवंश के अलावा कुछेक गोवंश की ही आवक हुई है। अन्य पशु तो नजर ही नहीं आ रहे।

वर्ष दर वर्ष वंशवार पशुओं की संख्या
पशु 2016 2017 2018 2019
गौवंश 4501 3433 3282 333
भैंसवंश 11 55 68 25
उष्ट्रवंश 501 996 1103 896
अश्ववंश 76 139 101 30
बकरा-बकरी 37 63 28 04


नियमों के कारण आई समस्या
यह सही है कि मेले में पशुओं की संख्या में पिछले वर्षों में कमी हो रही है। इसका प्रमुख कारण कुछ नए नियमों का लागू होना भी है। दस्तावेजों की भी अनिवार्यता है। इससे पशुपालकों का मेले के प्रति रूझान कम हुआ है। विभाग की ओर से सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है।
डॉ. खुशीराम मीना, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग, करौली