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दूसरों के घर रोशन करने वाले उदास

गुढ़ाचन्द्रजी. दीपोत्सव पर घर-आंगन को दीपकों से रोशन करने वाले कुम्भकार रोशनी के पर्व पर उदास हैं। उनको दीपक बनाने में हो रही मेहनत और आ रही लागत के मुकाबले में कम दाम मिल पाते हैं।

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दूसरों के घर रोशन करने वाले उदास

दूसरों के घर रोशन करने वाले उदास

गुढ़ाचन्द्रजी. दीपोत्सव पर घर-आंगन को दीपकों से रोशन करने वाले कुम्भकार रोशनी के पर्व पर उदास हैं। उनको दीपक बनाने में हो रही मेहनत और आ रही लागत के मुकाबले में कम दाम मिल पाते हैं। इसके बाद भी वे एक माह पहले से दीपक बनाने में जुटे हैं।

यहां बस स्टेण्ड़ के समीप चाक पर मिट्टी के दीपक बना रहे टन्नी कुम्हार ने बताया कि पहले मिट्टी लाकर उसका चूरा करते हैं, छानते हैं, गलाते हैं फिर लुगदी तैयार करते हैं। फिर चाक पर रखकर दीपक बनाकर उन्हें सुखाते हैं, फिर आग में तपाते हैं और आखिर में गेरू से रंग भर देते हैं। तब जाकर दीपक तैयार होते है। बाजार में १० रुपए के १५ या २० दीपक बेचते हैं। इसमें मेहनत अधिक होती हैं, लेकिन कमाई कुछ नहीं।

बाहर से मंगाते है दीपक
समय के बदलाव के साथ ही मिट्टी के दीपकों की मांग कम होने लगी है। लोग सजावटी व डियाइन के दीपक अधिक पसंद करते हैं। इसके चलते जयपुर, दौसा, बसवा आदि स्थानों से छिजाइन के दीपक मंगाए जाते है, जिनकी कीमत सामान्य दीपकों से अधिक होती है। ऐसे में उनके धंधे में मंदा चल रहा है लेकिन अधिकांश कुम्भकार पुश्तैनी धंधा होने से इस काम में लगे हैं।