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माता जानकी संग विराजित हैं श्रीरघुनाथजी, सूर्य साक्ष्य में होती ‘राजा आरती’

माता जानकी संग विराजित हैं श्रीरघुनाथजी, सूर्य साक्ष्य में होती ‘राजा आरती’

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हिण्डौनसिटी. शहर के तुलसीपुरा में रघुनाथजी के प्राचीन मंदिर में भगवान श्रीराम माता जानकी के साथ विराजमान हैं। 650 वर्ष पुराने रियासतकालीन मंदिर में रघुनाथजी की सेवा पूजा का विधान आम मंदिरों से अलहदा है। यहां भोर में जागरण की मंगला आरती की बजाय सूर्यवंशी राजा के तौर पर सूर्यदेव की साक्ष्य में रघुनाथजी की राजा (शासन) आरती होती है। शहर में होने वाले धार्मिक आयोजनों में रघुनाथजी की प्रतिमा राजा के रूप में पहुंचती है।
मंदिर के महंत धर्मेन्द्रदास शुक्ला के अनुसार रघुनाथजी का मंदिर शहर के प्रारंभिक मंदिरों में है। तत्कालीन जयपुर रियासत की हिण्डौन निजामत में मंदिर को जयपुर आमेर के राजा की ओर से जागीदारी मंदिर का दर्जा प्राप्त था। मंदिर में विराजमान श्रीरघुनाथजी को क्षेत्र के 365 गांवों की जागीरदारी थी। यानि रियासतकाल में इन गांवों का भूमि राजस्व मंदिर में संकलन के बाद राजा को पहुंचता था। ऐसे में मंदिर मेंं राजा के रूप में विराजित बिग्रह रघुनाथजी की सुबह सूर्योदय होने पर 6.15 बजे राजा आरती होती है। इसके बाद 11.15 बजे भोग-शृंगार, दोपहर में 12.15 बजे महाआरती के साथ विश्राम, शाम को 5.15 बजे संध्या दरबार, 7.15 बजे सांध्य आरती व रात 8.15 बजे शयन आरती होती है। महंत धर्मेन्द्रदास बताते हैं कि भवन के स्थापत्य के नजरिया में जाली-झरोखों से मंदिर मुगलकाल की देसी रियासतों के समय है। आजादी के बाद रियासतें खत्म होने पर मंदिर राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के संरक्षण में हैं। कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलने से सेवा-पूजा, भोग व आयोजन का प्रबंध निजी स्तर पर किया जाता है। वे महंत परिपाटी की 15वीं पीढ़ी हैं। उनके भाई घनश्याम दास सेवायत दायित्व संभाल रहे हैं।

दशहरा पर निकलती सवारी: दशहरा पर रामजी की शोभायात्रा में रघुनाथजी की सवारी निकलती है। शोभायात्रा में ट्रेक्टर में सजे रथ में रघुनाथजी की प्रतिमा राजपद के तौर पर सवारी निकाली जाती है। शाम को रावण के पुतला के दहन से पूर्व रघुनाथजी की आरती होती है।

मंदिर में जागीरदारी क्षेत्र से आई अन्य प्रतिमाएं

महंत धर्मेन्द्रदास ने बताया कि प्रारंभ में मंदिर में रघुनाथजी व माता जानकी का विग्रह विराजमान था।
मंदिर के जागीरदारी क्षेत्र के गांवों के बड़े देवालयों से आधी सदी पहले अन्य प्रतिमाओं का भी आगमन हुआ। ङ्क्षढढोरा गांव से सीता-रामजी, धौरेवाली गुफा से बिहारीजी (राधा कृष्ण) तथा गढ़ी बाढ़ करीरी से बालमुकुंदजी की प्रतिमा का आगमन हुआ था। मंदिर मेंं रामललाजी व हनुमानजी की प्रतिमा भी विराजित है।