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राधा नाम की महिमा, पढ़िए श्रीजी मंदिर में सारंगी बजाने वाले गुलाब की रोचक कथा

जो राधा नाम लेता है उसके आगे भगवान विष्णु चलते है। पीछे भगवान शिव चलते है। दाहिने इंद्र वज्र लेके चलता है और बांये वरुण उसके ऊपर छत्र लेके चलता है। यदि राधा नाम भूल से भी निकल जाये तो भी राधा रानी उसे अपना लेती है।

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बरसाना

बरसाने की पीली पोखर से प्रेम सरोवर जाने वाले रास्ते से कुछ हटकर वन प्रांत में एक पुराना चबूतरा है। लोग उसे गुलाब सखी का चबूतरा कहते हैं और आते-जाते उस पर माथा टेकते हैं।
गुलाब एक गरीब मुसलमान था। बरसाने की पवित्र धरती पर वो पैदा हुआ। ब्रह्मा आदि जिस रज की कामना करते हैं, उसका उसे जन्म से ही स्पर्श हुआ था। पढ़ा लिखा कुछ नहीं था पर सांरगी अच्छी बजा लेता था। श्री राधा रानी के मंदिर के प्रांगण में जो पदगान हुआ करता था, उसमें वह सांरगी बजाया करता था। यही उसकी अजीविका थी। मंदिर से जो प्रसाद और दान दक्षिणा प्राप्त होती उसी से वो अपना जीवन निर्वाह करता।

उसकी एक छोटी लड़की थी। जब मंदिर में वह सारंगी बजाता तो लड़की नाचती। उसका नृत्य देखने के लिए लोग स्तंभ की भांति खड़े हो जाते। उसके नृत्य में एक प्रकार का खिंचाव था। अपनी लड़की से वह बहुत प्यार करता उसका नाम था राधा। वह दिन आते देर न लगी जब लोग उससे कहने लगे, "गुलाब लड़की सयानी हो गई है। अब उसकी शादी कर दे।"

वह केवल गुलाब की बेटी न थी, बरसाने की बेटी थी। सभी उससे प्यार करते और उसके प्रति भरपूर स्नेह रखते। जब भी कोई गुलाब से उसकी शादी करवाने को कहता उसका एक ही उत्तर होता," शादी करूं कैसे? शादी के लिए तो पैसे चाहिए न?"

एक दिन श्री जी के मंदिर के कुछ गोस्वामियों ने कहा, " गुलाब तू पैसों की क्यों चिन्ता करता है? उसकी व्यवस्था श्री जी करेंगी। तू लड़का तो देख? "
जल्दी ही अच्छा लड़का मिल गया। श्री जी की कृपा से राधा के हाथ पीले हो गए और वह खुशी-खुशी अपने ससुराल विदा कर दी गई। राधा के विदा होते ही गुलाब गुमसुम सा हो गया। तीन दिन और तीन रात तक श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा रहा। लोगों को चिन्ता होने लगी कहीं वह पागल न हो जाए। लोगों ने बहुत समझाने का प्रयास किया पर उसके कान पर तो जूं तक नहीं रेंगी। चौथे दिन जब वह श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा था तो सहसा उसके कानों में एक आवाज आई, " बाबा ! बाबा ! मैं आ गई। सारंगी नहीं बजाओगे मैं नाचूंगी।"

उस समय वह सो रहा था या जाग रहा था कहना कठिन था। मुंदी हुई आंखों से वह सांरगी बजाने लगा और राधा नाचने लगी, मगर आज उसकी पायलों में मन प्राणों को हर लेने वाला आकर्षण था। इस झंकार ने उसकी अन्तरात्मा तक को झकझोर दिया था। उसके तन और मन की आंखे खुल गई। उसने देखा उसकी बेटी राधा नहीं बल्कि स्वयं राधारानी हैं। जो नृत्य कर रही हैं।

सजल और विस्फरित नेत्रों से बोला," बेटी! बेटी! और जैसे ही कुछ कहने की चेष्टा करते हुए स्नेह से कांपते और डगमगाते हुए वह अग्रसर हुआ उनकी ओर वे भागी मंदिर के ओर वह भागा उनके पीछे-पीछे।"

इस घटना के पश्चात गुलाब को कभी किसी ने नहीं देखा। उसके अदृश्य होने की बात एक पहेली बन कर रह गई। कुछ दिनों के पश्चात मंदिर के गोस्वामी जी शयन आरती कर अपने घर लौट रहे थे। तभी झुरमुट से आवाज आई," गोसाई जी! गोसाई जी!"
गोसाई जी ने पूछा, " कौन?"
गुलाब झुरमुट से निकलते हुए बोला, " मैं आपका गुलाब।"
गोसाई जी बोले, "तू तो मर गया था।"
गुलाब बोला, " मुझे श्री जी ने अपने परिकर में ले लिया है। अभी राधा रानी को सांरगी सुना कर आ रहा हूं। देखिए राधा रानी ने प्रसाद के रूप में मुझे पान की बीड़ी दी है। गोस्वामी जी उसके हाथ में पान की बीड़ी देखकर चकित रह गए क्योंकि यह बीड़ी वही थी जो वह राधा रानी के लिए अभी-अभी भोग में रखकर आ रहे थे।"
गोसाई जी ने पूछा,"तो तू अब रहता कहां है?"
उसने उस चबूतरे की तरफ इशारा किया जो वहां के गोसाइयों ने उसकी स्मृति में बनवाया था।

निष्कर्ष

आपके मन में ये प्रश्न हो सकता है की उसने अपनी बेटी को याद किया था तो उसकी मुक्ति कैसे? राधा कोई साधारण नाम नहीं है। ये महाशक्ति का नाम है।
जो राधा नाम लेता है उसके आगे भगवान विष्णु चलते है। पीछे भगवान शिव चलते है। दाहिने इंद्र वज्र लेके चलता है और बांये वरुण उसके ऊपर छत्र लेके चलता है। यदि राधा नाम भूल से भी निकल जाये तो भी राधा रानी उसे अपना लेती है।

प्रस्तुतिः डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, सोरों, कासगंज

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