
Vijaraghagadh fort
कटनी. वर्ष 2026 में विजयराघवगढ़ रियासत की स्थापना के दो सौ वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं, लेकिन यह ऐतिहासिक अवसर प्रशासनिक उदासीनता और सांस्कृतिक उपेक्षा के साये में आता दिख रहा है। जिस रियासत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया, बलिदान दिए और आधुनिक हिंदी साहित्य को अमूल्य योगदान दिया, उसी की स्मृतियां आज अपने ही क्षेत्र में विस्मृत होती जा रही हैं।
सन 1826 में मैहर रियासत के राजा दुर्जन सिंह के निधन के बाद उनके दो पुत्रों—विष्णु सिंह और प्रयागदास के बीच विरासत का बंटवारा हुआ। विष्णु सिंह को उचेहरा से मैहर तक का क्षेत्र मिला, जबकि प्रयागदास को झुकेही से कैमोर होते हुए मुड़वारा के उत्तरी क्षेत्र तक का भूभाग प्राप्त हुआ। प्रयागदास ने कटनी और झपावन नदी के मध्य बंजारी ग्राम के निकट एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कर नई रियासत की स्थापना की, जिसका नाम उन्होंने अपने आराध्य श्रीराम के नाम पर विजयराघवगढ़ रखा।
राजा प्रयागदास एक सुसंस्कृत और धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे। ‘रामनिधि’ उपनाम से वे कविताएं भी लिखते थे। किले के भीतर श्रीराम मंदिर, पहाड़ी पर मैहर शैली का शारदा मंदिर, पंचमठा मंदिर, भगवान विष्णु का मंदिर सहित अनेक धार्मिक निर्माण उनके शासन की पहचान बने। उनके काल में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। सन 1845 में उनके असमय निधन के समय उनके पुत्र सरयूप्रसाद सिंह मात्र पांच वर्ष के थे।
अंग्रेजों ने शासन अपने हाथ में लेकर सरयूप्रसाद सिंह को शिक्षा के लिए बनारस भेज दिया। पढ़े-लिखे और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत सरयूप्रसाद सिंह 1857 की क्रांति में खुलकर कूद पड़े। उन्होंने महीनों तक अंग्रेजी सेना के खिलाफ संघर्ष किया, जिसमें कई अंग्रेज अधिकारी मारे गए। फरवरी 1858 में अंग्रेजों ने रीवा, नागौद और अजयगढ़ की सेनाओं की मदद से विजयराघवगढ़ पर कब्जा कर लिया। अंतत: 1865 में सरयूप्रसाद सिंह को गिरफ्तार कर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और काला पानी की सजा सुनाई गई। कारावास के अपमान से बचने के लिए उन्होंने आत्मबलिदान कर दिया। इसके साथ ही विजयराघवगढ़ रियासत को अंग्रेजों ने जप्त कर लिया।
सरयूप्रसाद सिंह के एकमात्र पुत्र ठाकुर जगमोहन सिंह मात्र एक वर्ष के थे। उन्हें बनारस के क्वींस कॉलेज में शिक्षा दिलाई गई, जहां उनकी मित्रता भारतेंदु हरिश्चंद्र से हुई। वे भारतेंदु मंडल के प्रमुख सदस्य बने। ठाकुर जगमोहन सिंह ने 14 वर्ष की उम्र में कालिदास की कृति का हिंदी अनुवाद किया और आगे चलकर हिंदी का पहला कल्पनाप्रधान उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ रचा। आधुनिक गद्य, प्रकृति चित्रण और अनुवाद परंपरा को उन्होंने नई दिशा दी। छत्तीसगढ़ में साहित्य को संगठित करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। वहां उन्हें राजकीय साहित्यकार का दर्जा मिला और पुस्तकालय तक स्थापित किए गए।
दुखद पहलू यह है कि मध्यप्रदेश, कटनी जिला और स्वयं विजयराघवगढ़ में न तो ठाकुर जगमोहन सिंह और न ही रियासत के बलिदानी इतिहास को वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार हैं।
मध्यप्रदेश शासन के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को विजयराघवगढ़ महोत्सव मनाने हेतु बजट की घोषणा की जाती है, किंतु विगत तीन वर्षों से यह महोत्सव आयोजित नहीं हुआ। न ही घोषित बजट का कोई स्पष्ट विवरण सामने आया है।
स्थानीय बुद्धिजीवियों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि रियासत की 200वीं वर्षगांठ पर राजा प्रयागदास सिंह, क्रांतिकारी सरयूप्रसाद सिंह और साहित्य मनीषी ठाकुर जगमोहन सिंह की स्मृति में राज्य संस्कृति विभाग, कटनी जिला प्रशासन और विजयराघवगढ़ नगर परिषद को ठोस और स्थायी पहल करनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढिय़ां अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके।
Published on:
04 Jan 2026 09:45 am
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