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Breaking: इस जिले में हर दूसरे दिन हो जा रही एक बच्चे की मौत, माताओं की उजड़ रही गोद, हर कोई हैरान, देखें वीडियो

नौ माह तक सैकड़ों कष्ट सहते हुए बच्चे को मां कोख में रखती है। परिवार में आने वाले मेहमान को लेकर खुशियां बांटने की बड़ी तैयारी होती है, लेकिन बच्चे को जनने के बाद मां अपने लाल का मुंह तक नहीं देख पाती। बच्चे भी जन्म लेकर असमय कालकलतिव हो जा रहे हैं। जिला अस्पताल में हर दूसरे दिन एक बच्चा दम तोड़ रहा है।

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Balmeek Pandey

Jan 10, 2020

कटनी. नौ माह तक सैकड़ों कष्ट सहते हुए बच्चे को मां कोख में रखती है। परिवार में आने वाले मेहमान को लेकर खुशियां बांटने की बड़ी तैयारी होती है, लेकिन बच्चे को जनने के बाद मां अपने लाल का मुंह तक नहीं देख पाती। बच्चे भी जन्म लेकर असमय कालकलतिव हो जा रहे हैं। जिला अस्पताल में हर दूसरे दिन एक बच्चा दम तोड़ रहा है। बेहतर व्यवस्था और डॉक्टरों द्वारा देखरेख किए जाने के दावे के बीच हकीकत चौकाने वाली है। जिले में पिछले तीन साल में बच्चों के मौत का आंकड़ा घटना की बजाय बढ़ता जा रहा है। जिला अस्पताल के सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में एक साल में चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 1 जनवरी 2019 से 31 दिसंबर 19 तक जिला अस्पताल में 191 बच्चों ने दम तोड़ दिया है। पिछले तीन साल में 488 बच्चों ने दम तोड़ दिया है। करोड़ों रुपये की यूनिट, लाखों रुपये के चिकित्सक व कर्मचारी, स्वास्थ्य सहित महिला बाल विकास द्वारा हर माह लाखों रुपयें से पोषण के दावे जिले में सब फेल साबित हो रही हैं। 2017 में 129, 2018 में 168 और 2019 में नवजातों की मौत का आंकड़ा बढ़कर 191 हो गया है।

 

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यह है मौंत के प्रमुख कारण
बच्चों की मौत के प्रमुख कारण आरडीएस सिंड्रॉम है। इसमें बच्चे समय से पहले कमजोर होते हैं। इसके अलावा बर्थ एक्सपेसिया है इसमें बच्चा गर्भ से ठीक ढंग से बाहर नहीं निकल पाता व मस्तिष्क को ऑक्सीजन नहीं मिलती। इसके अलावा सेप्टीसीमिया जो केयर न होने से पूरे शरीर में फैल जाता है। बता दें कि एसएनसीयू के लिए यूनीसेफ का प्रोटोकॉल होता है। इसमें ऑक्सीजन का प्रतिशत तय करने के वाली एबीजी मशीन ऑन रहना चाहिए, एक बेड पर सिर्फ एक ही बच्चा एडमिट होना चाहिए।

 

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नहीं है वेंटीलेटर की सुविधा
जिला अस्पताल में अत्याधुनिक एसएनसीयू बनाया गया है, लेकिन अभी तक यहां पर वेंटीलेटर की सुविधा नहीं है। चिकित्सकों का कहना है कि वेंटीलेटर होता तो मौत का आंकड़ा काफी कम होता। वेंटीलेटर होने से यदि किसी बच्चे को खुद से सांस लेने में दिक्कत होती है तो यह मदद करता है, हॉर्ट रेट भी सही रहता है और बच्चे को दवाएं देने में आसानी होती है। इसको लेकर अस्पताल प्रबंधन सिर्फ इंतजाम की बातें कर रहा, लेकिन अभी तक मशीन नही आई।


यह है तीन साल में मौत का आंकड़ा
वर्ष भर्ती अस्पताल बाहरी मौत
2019 2100 886 1214 191
2018 1723 720 1003 168
2017 1382 532 850 129
————————————————
योग 5205 2138 3067 488
————————————————

फैक्ट फाइल
– 20 से अधिक हैं एसएनसीयू में वॉर्मर, जिनमें बच्चों को रखकर बचाने किया जाता है प्रयास।
– 2 से तीन बच्चे कर दिए जाते हैं गंभीर होने पर रैफर, वेंटीलेटर न होने के कारण बनती है यह स्थिति।
– 15 से 20 महिलाएं प्रतिदिन पहुंचती हैं प्रसव के लिए, सीजन में 40 तक पहुंचता है आंकड़ा।
– 8 से 10 प्रसव कराए जाते हैं प्रतिदिन, सीजन में 25 से 30 महिलाएं देती हैं बच्चों को जन्म।
– 1 से 2 केस खून की कमी, हाइ रिस्क, परिजनों द्वारा ब्लड आदि न दिए जाने सहित केयर न होने के कारण केस किए जाते हैं रैफर।

 

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ऐसे रोकी जा सकती हैं बच्चों को मौतें
– गर्भवती महिलाओं की देखभाल हो और उन्हें भत्ता दिया जाए ताकि ये महिलाएं मजदूरी करने के लिए न जाएं और अपने खानपान पर ध्यान दे सकें।
– अगर बच्चा कमजोर पैदा होता है तो उसकी देखलाल के लिए जिले में कई सेंटर खोले जाएं, भर्ती करने की सुविधा ब्लॉक स्तर पर हो।
– प्रसव के 48 घंटे बाद सभी को घर भेज देते हैं, और ये दो किलो का बच्चा या तो घर में मर जाता या अस्पताल में, ठंड के मौसम में इन दो किलो के बच्चों को गर्म रखना पड़ता है। इसके लिए भर्ती की सुविधा ब्लॉक स्तर पर हो।
– आंगनबाड़ी को मजबूत करते हुए आशाओं द्वारा घर-घर जाकर नवजात की देखभाल सुनिश्चित हो, इसका एक मॉनिटरिंग सिस्टम हो।
– प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मजबूत किया जाए वहां पर प्रशिक्षित डॉक्टरों की हर समय मौजूदगी के साथ-साथ भर्ती और नवजात की देखभाल की सुविधा हो।

खास-खास:
– गर्भवती महिला व गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव।
– आंगनवाड़ी के माध्यम से समय पर सही पौष्टिक आहार न मिलना व महिला को प्रोटिन विटामिन की कमी।
– घर के लोगों को महिला के स्वास्थ्य को लेकर जागरूक न होना, गर्भावस्था के दौरान भारी काम अथवा भारी वजन उठाने से बचना।

 

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जच्चा भी नहीं सुरक्षित
जिले में सिर्फ नवजात बच्चों की ही नहीं बल्कि प्रसूताएं भी औसत से अधिक दम तोड़ रही हैं। एक साल में 44 प्रसूताओं को जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2017-18 में 51, 2018-19 में 47 महिलाओं की मौत हुई है। गर्भवती महिलाओं के रजिस्ट्रेशन के बाद से निगरानी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता करती है। यह दावा है कि उनकी प्रॉपर देखरेख, टीकाकरण, पूरक पोषण आहार दिया जा रहा है, बावजूद महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हंै। महिलाएं एनीमिक हो रही हैं असर शिशु पर भी पड़ रहा है।

इनका कहना है
प्री मिच्योर और संक्रमण के कारण बच्चों की मौत हो रही है। एसएनसीयू में बेहतर ढंग से बच्चों की केयर की जाती है। मौसम की प्रतिकूलता से बच्चों को बचाना जरुरी होती है। जन्म के तुरंत बाद मां का दूध बेहद जरुरी है।
डॉ. नीलम सोनी, एसएनसीयू प्रभारी।