
Children Falling Victim to Body Shaming
कटनी. स्कूल और कॉलेज जहां बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की नींव रखते हैं, वहीं कुछ शरारती बच्चे कई बार मानसिक पीड़ा का कारण भी बनते जा रहे हैं। मोटापा, रंग, कद, आवाज, शरीर की बनावट और पहनावे को लेकर ताने देते फिरते हैं। इन्हीं कारणों से कई छात्र-छात्राएं बॉडी शेमिंग का शिकार हो रहे हैं। चिंता की बात यह है कि अधिकतर मामलों में यह पीड़ा अनदेखी रह जाती है और बच्चे चुपचाप इसे सहते रहते हैं।
पीडि़त छात्रों के अनुभव बताते हैं कि मोटापा या दुबलापन, रंग (ज्यादा गोरा या सांवला होना), हाइट (कम या ज्यादा कद), आवाज (पतली या भारी), कपड़े और स्टाइल, लडक़ों में मसल्स और फिटनेस आदि इन बातों को लेकर मजाक, तंज और कभी-कभी अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं।
अधिकांश मामलों में बॉडी शेमिंग क्लासमेट्स, सीनियर छात्र, कभी-कभी शिक्षक द्वारा की जाती है। पड़ोसी या रिश्तेदार भी कई बार ओये मोटे, टकले, सुखट्टे, बुटलर, बानबोट, लंबू, गोलगप्पे, गोलूमोलू आदि नामों से संबोधित करते हैं। कई बार यह मजाक के नाम पर होती है, लेकिन इसका असर गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है।
कक्षा 9 की एक छात्रा बताती हैं मेरे वजन को लेकर रोज साथी कमेंट होते थे। धीरे-धीरे मैंने क्लास में बोलना बंद कर दिया। ऐसे में स्कूल जाना बोझ लगने लगता है। वहीं कॉलेज छात्र का कहना है कि उसने तो मोटापन होने के कारण हर साथी के कमेंट से तंग आ चुका था। लडक़ों से यही उम्मीद होती है कि वो लंबे और मस्कुलर हों। मेरी हाइट को लेकर मजाक उड़ाया गया। इससे मेरा कॉन्फिडेंस पूरी तरह टूट गया।
बॉडी शेमिंग का असर सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक और शैक्षणिक भी होता है जैसे कि, पढ़ाई में ध्यान न लगना, आत्मविश्वास में कमी, स्कूल/कॉलेज जाना छोड़ देना डिप्रेशन और एंग्जायटी, खुद को दूसरों से अलग-थलग करना आदि है। अधिकांश सरकारी स्कूलों व निजी स्कूलों और कई निजी संस्थानों में आज भी प्रशिक्षित काउंसलर की व्यवस्था नहीं है। जहां काउंसलर हैं, वहां भी बच्चों को यह नहीं बताया जाता कि वे किस तरह और किन मुद्दों पर उनसे संपर्क कर सकते हैं। हालांकि परेशान बच्चे स्कूल प्रबंधन या प्राचार्य, स्कूल काउंसलर से, बाल कल्याण समिति, अभिभावक, चाइल्ड हेल्पलाइन आदि में शिकायत कर सकते हैं। हालांकि शिक्षकों का कहना है कि बॉडी शेमिंग से जुड़ी औपचारिक शिकायतें बहुत कम सामने आती हैं, क्योंकि बच्चे डर या शर्म के कारण बोल नहीं पाते।
मनोचिकित्सक डॉ. संदीप निगम का कहना है बॉडी शेमिंग बच्चों के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाती है। यह धीरे-धीरे डिप्रेशन, सोशल एंग्जायटी और आत्मग्लानि में बदल सकती है। स्कूलों में संवेदनशीलता, काउंसलिंग और जागरूकता बेहद जरूरी है। बच्चों को यह समझाना होगा कि हर शरीर अलग और सामान्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में एंटी-बुलिंग और एंटी-बॉडी शेमिंग नीति लागू हो, शिक्षकों को संवेदनशील व्यवहार का प्रशिक्षण मिले, बच्चों को खुलकर बोलने का सुरक्षित माहौल दिया जाए, माता-पिता भी बच्चों की भावनाओं को गंभीरता से सुनें, बॉडी शेमिंग मजाक नहीं, एक मानसिक हिंसा है। यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके दुष्परिणाम बच्चों के पूरे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
Updated on:
11 Jan 2026 11:15 am
Published on:
11 Jan 2026 11:14 am
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