कटनी. आदिवासियों के जीवन स्तर को उठाने के लिए मछली पालन विभाग द्वारा मछली पालन के लिए जिले में 14 समूह बनाकर तालाबों व जलाशयों के पट्टे दिए गए हैं। हजारों हेक्टेयर के तालाब में मछली पालन के बाद भी आदिवासियों का जीवन स्तर ऊपर नहीं उठा। इसके लिए जब जिला पंचायत में समूह की बैठक जिला पंचायत सीइओ जगदीशचंद्र गोमे ने समीक्षा की तो मछली पालन विभाग की गंभीर बेपरवाही खुलकर सामने आई। सदस्यों ने बताया कि उन्हें ना तो जाल मिल रहा ना बीज, मछलियों के लिए आहार मिल रहा ना ही मछली पकडऩे के लिए नाव की भी व्यवस्था की गई। सदस्यों ने गंभीर समस्या बताई कि उन्हें 5 हजार रुपये से लेकर 7 हजार रुपये हर दिन ठेकेदार को जाल के चुकाने पड़ रहे हैं, जिसमें उनका सारा रुपया बर्बाद हो जाता है, उन्हें किसी भी प्रकार का मुनाफा नहीं हो रहा। साथ ही मछली को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है जिससे मछली खराब होने के डर से उन्हें सस्ते दर पर मछली बेकनी पड़ रही है। गंभी विषय तो यह है कि ठेकेदार उनकी मेहनत का फायदा उठाकर मालामाल हो रहे हैं। सीईओ ने मछुआ सहकारी समितियों के अध्यक्षों व सदस्यों के अलावा विभागीय अधिकारी की बैठक ली। समस्या सुनकर विभाग की लापरवाही पर नाराजगी व्यक्त करते हुए सुधार के लिए सख्त निर्देश दिए।
अध्यक्ष व सदस्यों ने बताई ये समस्या
भनपुरा नंबर 2 समिति के अंतर्गत ठरका जलाशय सर्वाधिक बड़ा 274 हेक्टेयर का है। समिति में 70 सदस्य हैं, सीईओ ने जब समिति अध्यक्ष राजेश सिंह से पूछा कि आपकी समिति के खाते में कितने रूपये है तो उसने बताया कि 10 हजार रूपये के लगभग होना चाहिए। इस पर सीइओ ने कहा कि सबसे बड़े जलाशय वाली समिति की स्थिति ऐसी कैसे है। सदस्यों ने बताया कि हमें विभाग की ओर से न तो योजनाओं की जानकारी मिलती है न ही उसका लाभ। नाव बाजार में 20 हजार रुपये व महाजाल की कीम 20 व 30 हजार रूपये हैं। हम दोनों सामग्री ठेकेदार से 4-5 हजार रूपये किराये पर लेते हैं। वहीं मछली का बाजार रेट जो की डेढ़ सौ रूपये किलो रहता है, लेकिन ठेकेदार द्वारा हमें 60-65 रूपये की राशि दी जाती है और पूरा मुनाफा खुद कमा रहे हैं।
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लोन दिलाकर सुधारी जाएगी स्थिति
सीईओ ने विभाग के अधिकारियों से यह पूछा कि वे क्या कर रहे हैं। समितियों को 50-60 हजार रूपये का लोन क्यों नहीं दिया जा रहा। समिति सदस्य भी किसान हैं। उन्हें मुख्यमंत्री आर्थिक कल्याण योजना में शामिल कर लाभ दिया जाए। बैठक के दौरान बताया गया कि जिले में 14 आदिवासी मछुआ सहकारी समितियां कार्यरत है। इनमें भनपुरा नंबर 2 समिति जिसमें 70 सदस्य हैं को ठरका जलाशय आवंटित किया गया है। सिंघनपुरी सहकारी समिति में 59 सदस्य है। कुदरी समिति में 22 सदस्य हैं, उसे बोल्हा सागर सिमरा कुदरी जलाशय आवंटित है। जालासुर समिति में 21, विलायतकलॉ समिति में 25 सदस्य हैं लोखान जलाशय आवंटित है। इसी तरह दतला भादावर समिति जिसमें 25 सदस्य हैं को दतला जलाशय, जिसमें भजिया समिति को भजिया जलाशय, जगुआ समिति को जगुआ जलाशय, मालहन समिति को मालहन व झापी जलाशय, सगौना समिति को सगौना जलाशय, भीतरीगढ़ समिति को भीतरीगढ़ जलाशय आवंटित हैं।
खास-खास:
– कई तालाओं का नहीं हुआ गहरीकरण, सूखने से प्रभावित हो जाता है करोबार, दो तालाओं विलायतकला व सगौना में पेड़ होने से फट जाते हैं जाल, नीलामी के बाद पेड़ों को कराया जाएगा अलग।
– सदस्य नहीं बता रहे थे समस्या, मत्स्य विभाग के अधिकारियों को बैठक से किया बाहर तो गिनाईं समस्याएं, मछली आहार न मिलने व बीज 15 जून से 31 जून की बजाय अगस्त लास्ट में मिलने की बताई समस्या।
– सदस्यों ने बताया कि ताजी मछली 150 रुपये प्रति किलोग्राम, सामान्य 100 व छोटी 80 रुपये किलोग्राम बिकती हैं। सुरक्षित रखने का इंतजाम न होने से 60 रुपये में ठेकेदार को बेचने की होती है मजबूरी।
– जिले में एक बड़ा जलाशय बनवाकर तैयार किया जाएगा रेहू, कतला, कामनकार मछली का बीज, सस्ते दाम में समितियों को कराया जाएगा मुहैया, तालाब गहरीकरण के लिए भी होगी पहल।
– कई तालाबों को गर्मी में नलकूप से पानी भरकर बचाने की मजबूरी, मत्स्य विभाग से जुड़े ठेकेदार समितियों को जाल के माध्यम से करते हैं गुमराह, कई तालाबों में ठेकेदारों का है कब्जा।
– मत्स्य विभाग के सहायक संचालक सहित विभागीय अधिकारी-कर्मचारी सिर्फ पट्टा दिलाने व सेमीनार की पूरी कर रहे औपचारिकता।